Wednesday, November 4, 2015

सहिष्णुता और असहिष्णुता पर बहस और जमीनी सच्चाई -

यह अत्यंत दुखद स्थिति है कि आज देश में एक विचित्र तरह की बहस हो रही । कौन सहिष्णु है और कौन असहिष्णु ? विचारधाराओं  की टकराहट लोकतन्त्र में सामान्य है और होनी चाहिए । सिद्धान्त, मान्यताएँ और और विचाधाराएँ असंख्य होती हैं और सभी मान्यताओं और विचारधाराओं को स्वाभाविक रूप से विकसित होने का माहौल लोकतंत्र की बुनियादी मांग होती है । आपसी खंडन-मंडन किया जा सकता है किंतु इस बौद्धिक प्रतिस्पर्धा में हिंसा एवं प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होता । सत्ता हो या अन्य विपक्षी राजनीतिक दल हों, किसी को जन सामान्य पर हमला करने या जान लेने का अधिकार संसार का कोई भी सभ्य समाज नहीं देता । भारत एक महान सभ्यता है क्योंकि यह अनेक समुदायों का समुच्चय है और इतने वैविध्य वाले लोगों मे कई विषयों पर  मतैक्य असंभव है । परंतु मतभेद का अर्थ किसी पर भी हमला करना नहीं होता । हर सामान्य नागरिक को जीवन जीने का मौलिक अधिकार प्राप्त है जिसे हमारा संविधान पुष्ट करता है । निजी खान-पान, आचार-विचार-व्यवहार की छूट और अधिकार हर नागरिक को इस देश मे प्राप्त है, फिर कोई समुदाय अन्य समुदाय के लोगों पर केवल उस समुदाय विशेष के खान-पान के तौर तरीकों को मुद्दा बनाकर अपने सामुदायिक अथवा वैचारिकता को सिद्ध करने के लिए अराजकता फैलाना कहां का न्याय है ? आज देशवासियों को गाय और गोमांस - का मुद्दा विकराल भयावह शक्ति बनकर आतंकित कर रहा है । इतने बरसों तक यह कभी मुद्दा नहीं बना था, फिर आज क्यों बन गया ? आज तक किसी को पड़ोसी की रसोई मे क्या पाक रहा है, पड़ोसी क्या खाता है, इसकी चिंता कभी नहीं थी । यह कोई बहस का वियशय कभी नहीं था । फिर आज क्यों हो गया ? क्या तथाकथित सत्ता पक्ष  और अन्य लोग भी यह भूल गए हैं हैं की भारत की सांस्कृतिकता बहुआयामी और बहुलतावादी है । मजहब, मान्यताएँ मनुष्य के बनाए होते हैं और ये सिद्धान्त मनुष्य के लिए होते हैं। मनुष्य सिद्धांतों के लिए नहीं होता । मजहब भी मनुष्य के लिए निर्मित एक आस्था है, मनुष्य- मजहब के लिए नहीं होता । मजहब मनुष्य के लिए होता है । मनुष्य की सत्ता, अस्तित्व और अस्मिता इन सबसे ऊपर है, सुप्रीम
है । मनुष्यत्व को ताक पर रखकर धर्म, मजहब के उन्माद में अपनी बात को ज़बरदस्ती मनवाने की कोशिश करना और यदि न मानें तो उन्हें नेस्तनाबूद करने का प्रयत्न करना इस देश के लिए घातक है । ऐसी अवसर पर समाज मे सदभावना और विश्वास पैदा करने के लिए लोकनायक ( जो भी है ) उसे आगे आकार मोर्चा संभालने की आवश्यकता है ।शीर्ष पर बैठे नेताओं का यह कर्तव्य है की जनता में फैले भय और अनिश्चितता की स्थिति को संभालें और ऐसे लोगों को नियंत्रण मे लाएँ जो देश की उदारवादी सांस्कृतिक चेतना को भंग करते हैं, निर्दोष जन सामान्य पर हमले करते हैं और हिंसा का मानौल रचते हैं । विरोश प्रदर्शन के तरीकों पर भी काफी जमकर बहस हो रही है । विरोधी स्वरों पर सवाल किए जा रहे हैं । विरोध सामयिक ही तो होता है, यदि इससे पूर्व की घटनाओं पर, उस समय इस तरह की प्रतिरोध की संस्कृति नहीं पनपी थी तो क्या आज कोई विरोध नहीं कर सकता  क्या ? वर्तमान की स्थितियों पर विचार करने के बदले लोग विरोध करने वालों की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं और उन्हें अपनी क्षिदर राजनीति से जोड़ कर विरोध के महत्व को कमतर आँकने का षडयंत्र रच रहे
हैं । जो भी हो, आज देश मे अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर खतरा तो मंडरा रहा है, इसमें दो राय नहीं है ।
राजनेता सारे के सारे पार्टी लाईन पर ही बहस करते हैं और परस्पर तू तू मैं मैं ही करते रह जाते हैं, एक दूसरे पर कीचड़ उछलने के सिवाय राजनेता जन सामान्य की भावनाओं को समझ पाने में नितांत असमर्थ और असहाय ढंग से पेश आ रहे हैं । नेताओं को धैर्य के साथ जनता की भावनाओं को समझकर उनका साथ देना होगा । जनता और नेता यदि आमने सामने हो जाएँ - तो परस्पर टकराहट ही होगी । और यह टकराहट लोकतन्त्र के लिए घातक है । जनप्रतिनिधि का यह कर्तव्य है की वह अपनी प्रजा के घावों पर मलहम लगाकर उसका उपचार करे, न कि उसके घावों को कुरेदकर उसे अधिक तकलीफ पहुंचाए । 

Wednesday, July 29, 2015

देश के इस सदी के महानायक के निधन से सारा देश शोक संतप्त है -

डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम भारत के सच्चे अर्थों मे महानायक थे/हैं । आदर्श शिक्षक, चिंतक,वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, राजनयिक, अध्येता, कलाप्रेमी, साहित्यप्रेमी, मानवतावादी, महामानव थे वे । ऐसी विभूतियाँ सदियों मे एक बार जन्म लेती हैं और अमर जो जाती हैं । कलाम साहब के लिए मृत्यु एक भौतिक सत्या भले ही हो लेकिन वे देशवासियों के हृदय मे हमेशा हमेशा के लिए अभिन्न होकर रच बस गए हैं । उन्हें हमसे कोई ताकत पृथक नहीं कर सकती । जो व्यक्ति, जिसका अस्तित्व, जिसकी मौजूदगी, शारीरिक से कहीं अधिक रूहानी हो जाए वह किसी से कैसे अलग हो सकता है । इस देश के हर शख्स मे वे बस गए हैं । उनकी आवाज़ देश के किसी न किसी कोने से हर पल सुनाईदेती थी और आगे भी उनकी आवाज़ की अनुगूँज हवाओं मे फिज़ाओं मे सदैव कंपन्न पैदा करती रहेगी । जो उनहमे एक बार दूर से ही सही देख लेता था उन्हें कभी नहीं भूल सकता था, एक बार जो उनहमे प्रत्यक्ष देखे या सुन ले वह उनकी आवाज़ और उनके चेहरे को कैसे भूल सकता है ।उन्मने अपार ऊर्जा कूट कूट कर भारी हुई थी । वे ऊर्जा के पॉवर हाऊस थे । उम्र उनको छू भी नहीं सकी थी । वे निरंतर कार्यरत रहने वाले कर्तव्यनिष्ठ कार्यकर्ता थे । देश के एक सिपाही थे जो देश की तीनों सेनाओं के सेनाध्यक्ष भी थे ( पाँच वर्षों के लिए - राष्ट्रपति पद पर रहते हुए )
उनका जीवन दर्शन अद्भुत था । वे सत्य के पुजारी थे । निराडंबर, निडर, स्पष्टवादी, पारदर्शी, आध्यात्मिक चेतना से युक्त, ईश्वर तत्व मे विश्वास करने वाले, आस्थावान, अपने कर्तव्य और दायित्व के प्रति प्रतिफल जागरूक और सतत परिश्रमी स्वभाव के युगपुरुष थे वे । उनमें कोई भी ऐब नहीं दिखाई देती थी । वे एक ऋषि थे, स्वयं एक साधक थे । सरलता,सादगी और आत्मीयता उनके व्यक्तित्व के आकर्षण थे । देश की युवा पीढ़ी के प्रति वे वीचेश चिंतित रहा कराते थे । बच्चों से विशेष प्यार थी उन्हें । देश को बदलने की ताकत युवा पीढ़ी मे ही वे मानते थे । समाज को बदलने के लिए, समाज मे व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए तीन शक्तियों का उल्लेख वे करते थे- माता,पिता और शिक्षक । गुरु का स्थान अत्यंत पवित्र और पावन होता है।
उनमें उच्च कोटी नायकत्व के लक्षण  विद्यमान थे । कठिन कार्य को स्वीकार करना नायक का लोकसन होना चाहिए । विफलता का दायित्व स्वयं जो लेता हो और सफलता का श्रेय जो साथियों को देता हो वही सच्चा नायक होता है । उनमें यह गुण विद्यमान था ।
मनुष्य का जन्म संसार मे कर्म करने के लिए होता है । निष्क्रिय और निठल्ले बैठे रहने के लिए नहीं होता । कर्मवाद के वे दृढ़ पक्षधर थे । हर व्यक्ति का एक कर्म निर्दिष्ट होता है, कोई कम छोटा या बड़ा नहीं होता । कर्म, कर्म होता है ।  भय को मन से निकाल दो, डरो मत, कभी मत डरो, आगे बढ़ो, विफलता का सामना करना, मुक़ाबला करना सीखो, सफलता मे घमंडी मत बनो । सफलता को भी सही तरीके से स्वीकार करना चाहिए और उसे सही ढंग से आचरण मे लाना चाहिए । विफलता मे निराशा अकर्मण्य और निष्क्रिय बना देती है इसलिए गिरकर पुन: उठो और काम पर लग जाओ - ये कलाम साहब के संदेश हैं । देश के प्रति अप्रतिम लगाव और आत्मीयता उनमें जुनून की हद तक मौजूद थी ।
वे एक कर्मयोगी थे । उनका जीवन अनुकरणीय और चिरस्मरणीय है । उन्हें शत शत नमन शत शत नमन । 

Thursday, September 11, 2014

देश के बुद्धिजीवियों को हिंदी की चिंता नहीं !

यह बहुत ही चिंता  का विषय है कि छात्रों में (स्कूल और कॉलेज ) में भारतीय भाषाओं और हिंदी की संवैधानिक स्थिति के संबंध में ज्ञान पूरी तरह शून्य है । इधर मुझे कई विद्यालयों मे जाने का अवसर मिला । हिंदी के छात्रों को संविधान में हिंदी से संबंधित अनुच्छेदों के बारे में अनभिज्ञता देखकर दुख और आश्चर्य हुआ । हमारे देश के शिक्षित नागरिकों भी इन तथ्यों के बारें जानकारी नहीं । लोग इसे जानना महत्वपूर्ण नहीं मानते। हमारा देश बहुभाषी देश है । संस्कृतिबहुलता इस देश की मूल प्रकृति है । संविधान में 22 भाषाओं का उल्लेख आधिकारिक रूप से आठवीं अनुसूची  में हुआ है । बहुत कम लोगों को इन बाईसों भाषाओं की जानकारी है । अधिक लोग नहीं जानते कि इन बाईस भाषाओं की सूची में अंग्रेजी नहीं शामिल की गई है । जब कि अंग्रेजी साहित्य, भारतीय साहित्य का गौरवशाली हिस्सा है । भारतीय अंग्रेजी लेखन विश्व ख्याति प्राप्त है । चेतन भगत, अनीता देसाई, मुल्कराज आनंद, किरण देसाई, विक्रम सेठ, शोभा डे, खुशवंत सिंह, आदि सुविख्यात भारतीय लेखक अंग्रेजी साहित्य को भारतीय साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया ।
इसके अलावा, लोगों मे इस तथ्य के प्रति भी उदासीनता है कि हिंदी को संविधान मे राजभाषा का ही दर्जा दिया गया है । संविधान मे कहीं भी हिंदी के लिए 'राष्ट्रभाषा ' शब्द का प्रयोग ही नहीं किया गया है। यह बहुत बड़ी त्रुटि है या सरकार (संविधान समिति की ) 'नीति ' - इसका खुलासा कहीं नहीं हुआ है जो कि कष्टदायक है और विवादों को जन्म देने वाला हथियार है । देशवासियों को भावनात्मक स्तर पर इसे राष्ट्रभाषा स्वीकार करने की अपेक्षा करना 'तकनीकी ' दृष्टि से सही नहीं लग सकता है । ऐसे तर्क की गुंजाईश तो है । वैसे आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी 22 भाषाएँ राष्ट्रीय भाषाएँ ही हैं, लेकिन हिंदी ही राष्ट्रभाषा  कहने का कोई मजबूत तर्क नहीं दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि देश के कई लोग इसे वैसे राष्ट्रभाषा मानने से इनकार करते हैं । संविधान का अनुच्छेद 351 - जो कि एक निर्देश है - में देश में हिंदी को प्रमोट करने के लिए निर्देश दिए गए हैं साथ ही इसमें हिंदी के स्वरूप को परिभाषित किया गया है । जो कि (1) सरल (2) हिन्दुस्तानी हो (3) सामासिक संस्कृति का प्रतीक हो (4) शब्द भंडार की समृद्धि - मूलत: संस्कृत और गौणत: अन्य भाषाओं से शब्द लिए जाएँ । ये निर्देश ही हिंदी को स्थूल रूप से राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने की ओर संकेत मात्र करता  है । हिंदी के स्वरूप को हिन्दुस्तानी रखने पर इस अनुच्छेद में बल दिया गया है ।
एक और महत्वपूर्ण सत्य/तथ्य की ओर ध्यान नहीं जाता है - अनुच्छेद 348 - जो न्यायपालिका की भाषा को निर्धारित करता है । इसके अनुसार न्यायपालिका और  संसद की भाषा अंग्रेजी होगी । ( कामकाज की भाषा ) । यह बहुत ही विचित्र है । भारत जैसे देश में जहां अंग्रेजी एक विदेशी भाषा है चाहे इसकी क्षमता दुनिया को जीतने की ही क्यों न हो, भारत के लिए तो यह एक विदेशी भाषा ही है और रहेगी। कोर्ट कचहरियों में कामकाज इसीलिए अंग्रेजी में ही होता है । इसीलिए कोई भी आम भारतीय कचहरी में अपना मामला ले जाने के लिए डरता है । फैसला भी नगइनत पृष्ठों मे अंग्रेजी में दिया जाता है जिसे समझने के लिए वकीलों को बड़ी रकम देनी पड़ती है ।  हिंदी को हालाकि संविधान के  अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा घोषित किया गया है (देवनागरी लिपि और अंतर्राष्ट्रीय अंकों के साथ ) फिर भी इसके साथ अंग्रेजीमें कामकाज करने की छूट का भी प्रावधान बहुत ही होशियारी से जड़ दिया गया है । यह अंग्रेजी वाली शर्त केवल 15 वर्षों के लिए थी, किन्तु इसे भी हमेशा के लिए  बढ़ा दिया गया । इसीलिए मूलत: राजभाषा के रूप में भी केवल खानापूरी कर रही है और अंग्रेजी मूल राजभाषा बनकर राज कर रही है । संविधान के अनुच्छेदों में ऐसे कई विरोधाभास हैं कि उन्हें समझने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है और अंत में जो बात समझ में आती है वह यही कि हमें अंग्रेजी में कामकरने की संवैधानिक छूट मिली हुई है । ( इसमें कोई दो राय नहीं )।
राजभाषा हिंदी कार्यान्वयन में उलझनें पैदा करने के लिए कई समितियां, उपसमितियाँ, आयोग, बनाए गए हैं । इनके नियम समयसमय पर संशोधित होते रहे हैं जिस कारण वर्तमान में लागू नियमों या अधिनियमों के बारेमें स्पष्ट जानकारी हासिल करना असंभव है ।
एक और विडम्बना यह भी है कि राजभाषा कार्यान्वयन का काम केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है जब कि संसाधन जुटाने और हिंदी प्रशिक्षण एवं हिंदी की अन्य गतिविधियों को प्रमोट करने का दायित्व मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सौंपा गया है । इसमें भी काफी भ्रामक स्थितियाँ हैं । केंद्रीय हिंदी निदेशालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान और वैज्ञानिक एवं तकनीकी भाषा आयोग, केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो - ये सभ मानव संसाधन विकास के आढ़ें हैं । देश भर के केंद्र सरकार के कार्यालय, बैंक और उपक्रम - ये गृह मंत्रालय के अंतर्गत राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयन के लिए बाध्य हैं ।
एक सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि हिंदी राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है बल्कि यह केवल एक तबके का सिर दर्द बनकर रह गया है और वह तबका है - हिंदी पढ़ने लिखने वालों का और हिंदी पढ़ाने वालों का । इनके सिवाय कोई हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के संबंध में न सोचता है और न ही इस राष्ट्रीय समस्या/मुद्दा मानता है । इस ओर समूचे देश को सोचना होगा ।
एम वेंकटेश्वर

Thursday, September 4, 2014

शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ और सह - प्राध्यापकों को अभिवंदन

मैं अपने देश भर के सभी प्राध्यापक साथियों की सेवाओं के प्रति नतमस्तक होता हूँ जो अपने जीवन को अध्यापन के इस श्रमपूर्ण कठिन दायित्व के निर्वाह के लिए कटिबद्ध हैं ।
- एम वेंकटेश्वर  

शिक्षक दिवस की प्रासंगिकता

5 सितंबर का दिन भारतीय शिक्षकों के सम्मान का दिन होता है । भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ  राधाकृष्णन के जन्म दिन को उन्होंने स्वयं देश के शिक्षकों को समर्पित कर  दिया था । यह शिक्षकों के प्रति उनके सम्मान और आदर की भावना का द्योतक है । वे स्वयं एक उत्तम शिक्षक थे । वे अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर थे और देश कई विद्यालयों मे उन्होंने अध्यापन कार्य किया था । वे एक विश्वस्तरीय दार्शनिक, अध्यात्म दर्शन के प्रकांड पंडित, अंग्रेजी साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान, सुलझे हुए राजनयिक और संस्कृत भाषा के साथ वेद-वेदांगों के उद्भट ज्ञानी थे । वे एक कुशल और गम्भीर वक्ता के रूप मे विश्व भर मे पहचाने जाते थे । विश्व के अनेक महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों और समारोहों मे उन्होंने अपने चिंतनपूर्ण दार्शनिक व्याख्यानों से बुद्धिजीवियों को प्रभावित किया । वे एक आदर्श शिक्षक थे ।शिक्षकों के लिए आदर्श आचार संहिता के अनुपालन पर उन्होंने सदैव बल दिया । शिक्षक समाज का आदर्श व्यक्ति होता है, होना चाहिए। प्राचीन काल की गुरु शिष्य परंपरा मे गुरुओं के आश्रम मे रहकर विद्यार्जन किया जाता था । जीवन मे चारों आश्रमों का पालन किया जाता था । ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम । ब्रह्मचारी आश्रम केवल विद्याध्यन के लिए और ज्ञान अर्जन के लिए निर्णीत था। गुरु का स्थान और महिमा ईश्वर तुल्य माना जाता था । गुरु से ज्ञान प्राप्त कर व्यक्ति (शिष्य ) आजीविका की व्यवस्था करता और फिर विवाह करके गृहस्थ मे प्रवेश करता था । ज्ञानार्जन की यही भारतीय परंपरा सदियों से चली आई । आधुनिक युग में भी गुरु, शिक्षक के रूप मे परिवर्तित हुआ क्योंकि शिक्षक एक वेतन भोगी कर्मचारी बन गया किन्तु उसके जीवन के आदर्श वही हैं । आचार संहिता भी वही होनी चाहिए । आज हमारे देश मे शिक्षा का क्षेत्र संकटापन्न स्थितियों से गुजर रहा है ।  पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली ने देश की संस्कृति और सोच को बदलकर उपभोक्तावादी संस्कृति मे तबदील कर दिया है जिसका  दुष्परिणाम हमारे सामने मौजूद है । राष्ट्रीय चरित्र, नैतिक मूल्य, मानवीय संवेदनाएँ लुप्त होती जा रही हैं । शिक्षा का स्तर अपेक्षित लक्ष्य से कहीं दूर भटक गया है । हमारे देश के सर्वोत्तम शिक्षण संस्थान विश्व पटल पर प्रथम सौ मे स्थान नहीं पा रहे हैं । सरकारों की सतत परिवर्तनशील नीतियाँ और अन्य सामाजिक और राजनीतिक अराजकता के कारणों से देश की शिक्षा व्यवस्था मे एकरूपता का अभाव है और गुणवत्ता का ह्रास निरंतर होता जा रहा है । यह एक गहन चिंता का विषय है । शोध का क्षेत्र सबसे अधिक मूल्यहीनता और गुणात्मक ह्रास का शिकार हो गया है । शिक्षक दिवस हमें अपने कर्तव्यों का स्मरण कराता है । शिक्षकों के चरित्र निर्माण पर बल देता है । शिक्षक एक सेवक होता है । उस पर समूची बाल एवं युवा पीढ़ी के भविष्य के निर्माण का दायित्व टीका होता है । छात्रों मे राष्ट्रीय भावना/चेतना के विकास का दायित्व शिक्षक पर ही होता है इसलिए उसे स्वयं पहले इन मूल्यों को आत्मसात करना चाहिए । निष्पक्षता, नि:स्वार्थता, ईमानदारी, कर्मठता, कर्तव्यनिष्ठा, परिश्रम और दृढ़ संकल्प जैसे गुणों को सर्वप्रथम शिक्षक को अपने आप में विकसित करना चाहिए । यह तभी संभव है जब शिक्षक में उपर्युक्त मूल्यों के प्रति आस्था  होगी ।
आज हमें ऐसे शिक्षकों की नितांत आवश्यकता है जो नि:स्वार्थ भाव से अपना सर्वोत्तम छात्रों को दे सकें। ऐसे प्राध्यापक जो निरंतर अध्ययनशील हों, जो सर्वप्रथम अपने ज्ञान की सीमाओं का विस्तार प्रतिफल कराते रहें, जिससे कि अपने विद्यार्थियों में वे अद्यतन ज्ञान  का प्रसार कर सकें। उनमें अधिक से अधिक काम करने की ऊर्जा और शक्ति कायम रहे, जो बिना शर्त अपनी सेवाएँ शिक्षा क्षेत्र को दे सकें । कठिन से कठिन दायित्व को स्वीकारने की क्षमता जिनमें मौजूद हो, जो स्वयं असाधारन प्रतिभा संपन्न हो और जो निर्भीक हो, अनुशासनप्रिय हो, भ्रष्ट नीतियों और भ्रष्ट प्रलोभनों से विचलित न हो, जिसमें समन्वय का गुण हो, जो लोगों को जोड़ने मे विश्वास करता हो, जिसमें देश के प्रति अटूट श्रद्धा हो, जो स्त्रियों का सम्मान करता हो और स्त्री सशक्तिकरण की प्रक्रिया को बल और समर्थन दे सके । आज हमें ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है ।  
आइए शिक्षक दिवस के इस पावन पुनीत अवसर पर हम समवेत होकर यह संकल्प करें कि हम शिक्षक गण उपर्युक्त मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध होंगे । हम तैयार हैं चुनौतियों का सामना कर, भ्रष्ट शक्तियों से लड़ने के लिए और देश मे एक सुव्यवस्थित मूल्यवान शिक्षण व्यवस्था के निर्माण के लिए ।  शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ सारे देशवासियों को । मैं एक शिक्षक हूँ और मेरा जीवन उपर्युक्त मूल्यों के संवर्धन तथा परिरक्षण मे ही बीत रहा है । 

Tuesday, July 8, 2014

लोकसभा मे नई सरकार का नवीन दृष्टि से सम्पन्न - रेल बजट प्रस्तुत

नई सरकार का प्रथम रेल बजट आज संसद मे तृणमूल कांग्रेस दल के आलोकतांत्रिक विरोधी तेवर के बीच प्रस्तु किया गया । रेल मंत्री सदानंद गौड़ ने सुदृढ़ और सधी हुई प्रशांत मुद्रा मे रेल बजट को शालीन ढंग से पेश किया ।इस बजट के प्रति हमेशा की भांति ही विपक्षी दलों ( इस बार कांग्रेस और तृणमूलकांग्रेस और भा क पा ) के विरोधी तेवर प्रतिक्रिया निषेधात्मक और नाराजगी से भारी रही । यह तो होना ही था । अब जो भी सत्ता पक्ष प्रस्तुत करेगा उसका विरोध तो करना ही होता है, प्रतिपक्ष का तो काम ही यह है । यह नकारात्मक परंपरा हमारे देश की संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली मे बहुत पहले से चली आ रही  है । हमारे राजनीतिक दल  किसी भी राष्ट्रीय मुद्दे पर एकमत नहीं होते। सरकार द्वारा की गई किसी भी प्रस्ताव को प्रतिपक्ष राष्ट्र हित मे नहीं स्वीकार करती, प्रतिपक्ष हमेशा दलगत राजनीति करती रही है, आज फिर वही हुआ, हाला कि कांग्रेस संसद मे अल्पमत है
( केवल 44 सांसद ) फिर भी एक ओर तो वह नेता -प्रतिपक्ष का पद हासिल करने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही है ( संविधान के नियमों को जानते हुए ) और दूसरी ओर  बिना ठोस तर्क या आधार के रेल बजट के प्रति विरोध जता रही है ।
इस सरकार के रेल बजट को अनेक मायनों मे बहुत ही अलग ढंग का प्रगतिशील और आशाजनक बजट माना जा सकता है । पहली बार रेल बजट लोगों का मनभावन और मनलुभावन ( झूठे राहतों के बिना ) योजनाओं को ताक पर प्रस्तुत किया गया । भारतीय रेल पिछले दशकों की सरकारों के मंलुभावन स्कीमों के कारण सस्ते किराये की आड़ मे लगभग पटरी से उतरकर पूरी तरह से नष्ट होने के कगार पर पहुँच चुकी है, इसे पुनर्जीवित करने के लिए अपार पूंजी  की जरूरत है जो की इस समय ' छूट और राहत ' भारी योजनाओं से संभव  नहीं  है। इसी कारण मोदी सरकार ने रेल संगठन के पुननिर्माण की ओर ईमानदारी से ध्यान दिया है । बिना किसी संतुष्टीकरण की नीति को अपनाए हुए रुग्णप्राय रेल के कलेवर मे नए प्राण फूंकने का यह अभियान शुरू किया गया है जो की स्वागत योग्य है । ' बुलेट ट्रेन ' की कल्पना और उसे चरणबद्ध तरीके से देश के इतर हिस्सों मे भी शुरू करने की योजना सराहनीय है । गरीबी का रोना हम कब तक रोते रहेंगे, हमें गरेबी से भी उबरना है साथ ही  प्रगति और विकास के पथ पर दौड़ पड़ना है । ऐसे सुधारों की स्थितियों मे जनता को धीरज धारणा करना होगा । जनता को  संयम के द्वारा सरकार पर भरोसा कर उसे सकारात्मक कार्य करने की आज़ादी देनी चाहिए । प्रमुख रेल स्ट्रेशनों का आधुनिकीकरण, नई एक्सप्रेस रेलों का आरंभ, रेल मे यात्रियों की सुविधाओं मे सुधार, चलती गाड़ियों मे खानपान व्यवस्था मे अत्याधुनिक व्यवस्था आदि योजनाएँ जनकल्याण की हैं इनका स्वागत होना चाहिए ।
यदि ये सभीयोजनाएँ लागू हो जाती हैं तो हमें निकट भविष्य मे साफ सुथरी रेल गाड़ियों मे तेज रफ्तार से चलनी वाली गाड़ियों मे अधिक सुविधाजनक यात्रा का आनंद प्राप्त होने उम्मीद है । आइए हम सब इस रेल बजट को स्वीकार करें और सरकार को काम करने दें।
  

Monday, July 7, 2014

नई सरकार का पहला आम बजट - समूचे देश की नजर संसद की ओर ...

नई सरकार के सत्ता मे आते ही महंगाई बढ़ गई, रेल किराया बढ़ाया गया, पेट्रोल और डीजल के दामों मे वृद्धि हुई, रसोई गैस से सब्सीडी हटाने की तैयारी चलरही है, (जिसका परिणाम गैस भी महंगा होगा ), प्याज रुला रही है तो आलू टमाटर के भाव देशवासियों के मन मे आतंक पैदा कर रहे हैं । जन जीवन अस्त व्यस्त हो रहा है, यह एक सच्चाई है, जमीनी हकीकत है । सरकार की अपनी परेशानियाँ हैं, मौजूदा हर हाल के लिए पिछली सरकार की नाकामियाँ गिनाने से कोई फायदा नहीं, क्योंकि जनता ने नई सरकार को उन दुखों को दूर करने के लिए ही सत्ता मे लाया है और भी निर्विरोध । सरकार को एक जुट होकर देश के हित मे ठोस कारगर कदम उठाने होंगे । पहले दौर मे सरकार की मजबूरीयों को जनता ने उदारता के साथ सहलिया है । अर्थात रेलों की सुरक्षा, रखरखाव का भारी खर्च, रेल का आधुनिकीकरण जैसी  योजनाओं को अमल मे लाने के लिए जो मजबूरी मे रेल किराया बढ़या गया उसे कम से कम शिक्षित वर्ग तो स्वीकार कर ही रहा है लेकिन गरीबी की सीमा रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए यह स्थिति दुर्वह है । रंगराजन साहब ने गरीबी की सीमा रेखा 45 रुपये तय करके एक बार फिर गरीबों की हंसी उड़ाई  है । आज महानगरों मे 45 रुपये मे कोई भी आदमी कैसे जीवित रह सकता है ? हमारे नीति निर्माता अर्थशास्त्रीगण यदि इस तरह देश की आर्थिक स्थितियों का आकलन करेंगे तो हम कहाँ जाएंगे ? केवल आंकड़ों मे गरीबी के अंत की घोषणा करने के लिए लालायित अर्थ-शास्त्रियों केवल आइवरी टावर्स मे जी रहे हैं । यह इस देश का दुर्भाग्य है कि ऐसे लोग हमारे आका हैं। लेकिन ' मोदी सरकार ' से उम्मीद की जाती है की वे ऐसे नियंताओं के हाथों मे देश की अर्थ व्यवस्था को नहीं सौंपेंगे । नरेद्न्र मोदी जी देश के गरीबों और मध्य वर्ग के दुखों और अभावों को बेहतर समझते हैं । उनमें वह पूंजीवादी अहंकार लेश मात्र भी मौजूद नहीं है इसीलिए आम जनता की सारी अपेक्षाएँ उन्हीं पर हैं ।
देश मे अनेक गैर भाजपा शासित राज्य हैं जहां के हालात भिन्न हैं । आंध्र-तेलंगाना प्रदेशों का हाल अधिक बुरा  है । विभाजन की मार झेल रहे दोनों प्रदेशों की जनता बिजली, पानी, सूखा, बेरोजगारी, कुशासन और महंगाई की मार से बेहाल हो रही है । इस पर राजनेताओं के भड़कीले भाषण और अलगाववादी वैचारिक प्रचार से दोनों ओर के लोग सहमे सहमे से जीवन बिता रहे हैं ।  दोनों राज्यों ( नवनिर्मित ) के बीच नदी-जल बिजली के हिस्सेदारी  तथा राजस्व के बटवारे को लेकर घमासान मचा हुआ है । दोनों राज्यों के साझा राज्यपाल महोदय निष्क्रिय बैठे हुए हैं क्योंकि वे किसी को नाराज नहीं करना चाहते इसीलिए वे दोनों राज्यों मे जाकर ' ठकुर  सुहाती ' वचन बोलकर आते हैं । वे शायद दोनों ही मुख्य मंत्रियों से या तो डरते हैं या फिर दोनों को खुश रखना चाहते हैं !
आज सुपरीप कोर्ट ने एक अहम फैसले के द्वारा मुस्लिम पर्सनल ला को अवैध घोषित करार किया है । यह मानवीय अधिकारों की बहाली की दिशा मे भारतीय संविधान के अनुसार उपयुक्त और न्यायोचित निर्णय माना जरा है - विशेषज्ञों के दारा । लेकिन मुस्लिम समाज का एक समुदाय इससे सहमत नहीं है । शरीयत के नियमों का हावाला देकर मौलवियों के द्वारा जारी किए जाने फतवे अवैध घोषित किए गए हैं जो की मानवीय अधिकारों की अवमानना कराते हैं । इस मुद्दे पर आज शाम से ही सभी मीडिया चैनलों पर जोरदार बहस हो रही है । किसी भी समाज मे एक जैसी न्याय वयवस्था और एक जैसे ही नागरिक अधिकार होने चाहिए । धर्म के आधार पर अलग अलग नागरिक अधिकार और नियम कहाँ तक जायज़ हैं ? यह एक बहुत ही पेचीदा प्रश्न आज़ादी से ही इस देश के लिए समस्या बनकर रह गया है । अब शायद इसका निदान हो गया है ।
हमारे देश मे ' धर्म निरपेक्षता ' और ' सर्वधर्म समभाव ' जैसे सिद्धांतों के अर्थ गड्डमड्ड से हो गए हैं जिनकी सही सही व्याख्या आज तक नहीं पाई है । धर्म का अर्थ रिलीजन हो गया है जो कि भ्रामक और गलत
(अनुवाद )  है ।
संस्कृति बहुल देश मे सांप्रदायिक सौमनस्य अनिवार्य है । इस सौमनस्य के  लिए देशवासियों को धार्मिक सहिष्णुता और उदार दृष्टिकोण की आवश्यकता है । भारतीयता और राष्ट्रीयता सारे निहित स्वार्थों के ऊपर हो तो सारी समस्याएँ सुलझ सकती हैं ।