Tuesday, November 10, 2015

बिहार के चुनाव परिणाम - लोकतंत्र की विजय

बिहार प्रदेश अनेक विशिष्टताओं के कारण देश भर मे अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है । यह पुन: पुष्ट हो गया है कि बिहार की आम जनता मे एक विशेष राजनीतिक सोच और जागरूकता मौजूद है जो कि अन्य राज्यों की तुलना मे कहीं अधिक सतर्क और सक्रिय है । चाहे जातिगत समीकरण जो भी हों, जो कि आज देश भर मे व्याप्त है । हर राजनीतिक दल जातिगत समीकरणों का फायदा हर चुनाव मे उठाती रही है । यह जो चुनाव बिहार मे संपन्न हुए हैं, विधान सभा के - वे वास्तव मे एक नया इतिहास रच गए हैं । सत्ताधारी पार्टी की ऐसी करारी हार, एक नई जनचेतना को जागा गया है । पराजित पार्टी चाहे वह कोई भी हो, इस कदर बे आबरू हो जाएगी इसका अंदाजा किसी को नहीं था और किसी ने आईसीकल्पना नहीं की थी । इस चुनाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू यहभी रहा कि सारे देश की नजर इस ओर रही । क्योंकि इस चुनावी नतीजों मे प्रधानमंत्री जी साख और रसूख दांव पर लगी थी जिसे उन्हींके पार्टी के नुमाइंदों ने लोगों के सामने पक्षेपित किया था । वे लोग खुलकर कह रहे थे बिहार के परिणाम राष्ट्र की सोच को प्रतिबिम्बित करेगा और प्रभावित भी करेगा । ऐसा ही हुआ .। भा ज पा की पराजय राष्ट्र की सोच को प्रतिबिम्बित करती है, यदि हम भाजपा के प्रवक्ताओं की मान लें तो । निश्चित ही इस पराजय से भाजपा की साख पर असर तो पड़ा ही है, चाहे भाजपा के लोग इसे स्वीकार करें या न करें । यदि जीत जाती तो उसे तो भाजपा के प्रचारक लोग समूचे राष्ट्र का जनादेश कहते । लेकिन अब वे इससे मुकर क्यों रहे हैं ? यह भी देखा गया है कि पराजय के बाद बड़ी पार्टियां ( कांग्रेस और भाजपा दोनों ) अपने प्रचार नायकों की विफलता को छिपाने का प्रयास करती हैं और उन्हें बेदाग बनाए रखती हैं । और वे पराजय का ठीकरा किसी और के सिर फोड़ती रहती हैं । जो उनके प्रचार अभियान के नायक रहे हैं उन्हें पूरी तरह अपनी सुरक्षा के घेरे मे ले लेते हैं । पार्टी के भीतर कोई उनकी आलोचना नहीं करता । उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती ।
पराजया के कारणों की समीक्षा के नाम पर एक औपचारिकता का निर्वाह कर लिया जाता है । कोई भी ईमानदारी से पराजय के कारणों का आकलन नहींकारता । यह एक परिपाटी है । जो भी हो, यह पार्टी का अंदरूनी मामला है जिस पर आम जनता को बोलने का कोई अधिकार नहीं है ।
किन्तु आम जनता भाजपा के पराजय के कारणों को जानती है । अहंकार, बड़बोलापन, अनावश्यक मुद्दों को टूल देना, आपसी कड़ुवाहट, प्रतिद्वंद्वी पर व्यक्तिगत आक्षेप, ध्रुवीकरण की राजनीति, विभाजन की राजनीति, स्वयं को अजेय समझने का दर्प और अहंकार, अनावश्यक जातिगत, संप्रदायगत, धरमागत टिप्पणियाँ करना, जमीनी सच्चाईयोंकों ताक पर रखकर अवास्तविकताओं का परचा करना, स्थानीय स्थितियों से अनभिज्ञता, स्थानीय नेताओं की अनदेखी   और सबसे ऊपर अपने प्रतिद्वंद्वियों की ताकत का सही पूर्वानुमान करने मे भारी भूल कर बैठना है । भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का व्यवहार भी लोगों को नागवार गुजारा है । प्रधान मंत्री का तीस से अधिक सभाओं को संबोधित करना जिसमें बिना तैयारीके एक ही मुद्दे को दुहराना और प्रतिपक्ष वालों पर अनावश्यक अहदर शब्दों मे उनका मज़ाक उड़ाना आदि प्रचार अभियान के निषेधात्मक पक्ष हैं । विकास को केंद्र मे रखकर यदि भाजपा का प्रचार ईमानदारी से किया जाता तो तो कुछ लाभमिल सकता था । आज समस्या यह है कि हर राजनीतिक दल यही कहता है कि देश या राज्य मे जोभी कुछ थोड़ा सा विकास (जैसा ) हुआ है तो वह सिर्फ उन्हीं के शासन काल मे हुआ है और उससे पहले कुछ भी नहीं हुआ था, जैसे इन 67 वर्षों मे कुछभी नहीं हुआ, आज का भारत केवल 14 महीनों मे ही वर्तमान स्थ्तिती मे पहुंचा है । यह सोच और इसकी शब्दावली मे परिवर्तन लाना चाहिए । अब जन सामान्य केवल शुष्क भाषणों को नहीं सुनना चाहती । आम जनता ठोस नतीजे चाहती है जो दृश्य हो । केवल श्रव्य न हो ।
निश्चित ही बिहार के परिणाम देशवासियों को लोकतन्त्र के प्रति नई आशा जगाते हैं । वोट या मताधिकार बड़ी से बड़ी राजनीतिक पार्टी को धूल चटा सकता है । किसी भी पार्टी का दंभ, अहंकार और बड़बोलापन और परस्पर अपमान जनता को सही नहीं लगते । 

Saturday, November 7, 2015

राष्ट्र की उच्च शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता के मूल्यांकन की आवश्यकता

आज देश भर मे लगभग चारसौ पचास विश्वविद्यालय हैं जो कि यू जी सी के अधिकार क्षेत्र मे आते हैं , इनके अतिरिक अन्य तरह के व्यावसायिक व इतर डीम्ड यूनिवर्सिटी एवं राष्ट्रीय महत्व के संस्थान पेशाई
( प्रोफेशनल )  और गैरपेशाई ( नॉन प्रोफेशनल ) उपाधियों के लिए शिक्षण उपलब्ध करा रहे हैं । इन सबका विभाजन सरकारी और गैरसरकारी श्रेणियों मे किया गया है । सरकारी संस्थान जो मानवसंसाधन विकास मंत्रालय के अधीन, यू जी सी द्वारा अनुदानित होते हैं और जिन के अकादमिक एवं प्रशासनिक  गतिविधियों पर केंद्र सरकार का नियंत्रण होता है । देश मे करीब 20 केंद्रीय विश्वविद्यालय मौजूद हैं । राज्यों मे भी अपने विश्वविद्यालय हैं  जो यू जी सी और राज्य सरकारों के वित्तीय प्रबंधन से चलते हैं । पिछले कुछ दशकों से भारत सरकार ने निजी क्षेत्र में भी उच्च एवं तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षण संस्थानों को अनुमति दी है । ऐसे संस्थान यू जी सी के दायरे में नहीं आते । वे पूर्ण रूप से वित्तीय एवं इतर प्रशासनिक मामलों मे स्वतंत्र और स्वायत्त  संस्थाएं हैं । ऐसे संस्थानों के पास अत्याधुनिक संसाधन उपलब्ध हैं साथ ही इनमें बड़े पूँजीपतियों का अकूत पैसा लगा है । ये बहुत कल्पनातीत मोटी रकम फीस के रूप वसूल कर उत्तम और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करते हैं । ये अपनी डिग्रियाँ स्वयं देते हैं जो कि सारी दुनिया भर में मान्य होती हैं । आज देश मे गुणवत्ता के लिए इन्हीं शिक्षण संस्थाओं का बोलबाला है । यहाँ से शिक्षा प्राप्त व्यक्ति निजी क्षेत्र की कंपनियों एवं इतर तकनीकी व गैर तकनीकी क्षेत्र में ऊंचे पदों पर अत्यंत लाभप्रद वेतन पाते हैं । आज हमारी पारंपरिक विश्वविद्यालयी व्यवस्था सवालों के घेरे में आ गई है । केंद्रीय और राज्य शासित विश्वविद्यालय दोनों इस सत्य साक्षी हैं कि पिछले दो दशकों में शैक्षिक स्तरों मे निरंतर गिरावट आई है और यह गिरावट दिनों दिन बढ़ती जारही है । इसका एक सबसे प्रमुख कारण सरकारों की उच्च शिक्षा के प्रति बढ़ती उपेक्षा । यही स्थिति स्कूली शिक्षा की भी है । सरकार इतर वोट लुभावनी आर्थिक और सामाजिक पापुलिस्ट  योजनाओं में करदाताओं का पैसा मनमाने ढंग से खर्च कर रही है और शिक्षा के क्षेत्र की अनदेखी कर रही है । परिणामस्वरूप आज देश के अधिकतर विश्वविद्यालयों मे पिछले बीस - तीस बरसों से प्राध्यापकों की नियुक्तियाँ नहीं हुईहाइन , यदि कहीं कहीं हुईं भी हों तो वह नगण्य सी हुई हैं । वरिष्ठ प्राध्यापाक और प्रोफेसा लोग सेवानिवृत्त हो रहे हैं, उनकी जगहें बरसों से खाली पड़ी हैं । गुणी रचनात्मक दृष्टि के ज्ञान सम्पन्न वरिष्ठ प्रोफेसर  विश्वविद्यालयों से अवकाश प्राप्त कर जा रहे हैं, उन्हें  और कुछ समय के लिए रोक कर उनकी सेवाएँ लेने का कोई प्रावधान नहीं है, यदि कहीं किसी नियम के अनुसार उन्हें रोक रखना भी चाहें तो विश्वविद्यालयी प्रशासन तथाकथित छात्र एवं अन्य राजनीतिक संगठनों के खौफ से डरकर उत्तम कोटि के सेवा निवृत्त प्राध्यापकों/प्रोफेसरों की सेवाएँ लेने मे असमर्थ हैं । कई राज्यों मे प्राध्यापकों की सेया निवृत्ति की आयु केवल 55 या 58 या 60 वर्ष है  । जब कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों मे यह आयु सीमा 65 वर्ष तक की है ।  इस प्रकार की असमानता से भी अनेक असंगतियाँ उपजी हैं । 65 वर्ष के बाद भी कई प्राध्यापक/प्रोफेसर अध्ययन-अध्यापन और शोध मे सिद्धहस्त हैं किन्तु उन्हें उन्हीं के विश्वविद्यालय सेवानिवृत्ति के दूसरे ही दिन से त्याग देते हैं, उनके प्रति अपंणाजनक व्यवहार किया जाता है । एक ओर विभागों में रिक्तियाँ बढ़ रहीं हैं, दूसरी ओर अस्थाई तौर पर ही सही, रिक्तियों की भर्ती, इन सेवानिवृत्त आचार्यों की सेवाएँ  ली जा सकती हैं, किन्तु ऐसा नहीं हो रहा है जिससे एक बड़ी शून्यता और अंतराल आ गया है । दक्ष, योग्य, ज्ञानी, शोधदृष्टि संपन्न वरिष्ठ आचार्यों की सेवा से देश की उच्च शिक्षा की संस्थाएं वंचित हो रही हैं । यदि सेवानिवृत्त पदों पर नियमित  रूप से हर वर्ष    प्राध्यापकों की नियुक्तियाँ हों तो यह समस्या पैदा नहीं होगी । जैसा कि पचास और साठ के दशक तक होता रहा है । आज शिक्षा के क्षेत्र मे नियमित तौर पर नियुक्तियाँ नहीं हो रहीं है और सरकारों का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा है या सरकाएँ जानबूझकर इसकी आवश्यकता की अवज्ञा कर रहीं हैं । सरकारों की यह उदासीनता केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर एक समान है । वार्षिक निर्धारित वित्तीय आबंटन आज विश्वविद्यालयों के लिए सरकार नियमित रूप से नहीं कर रही है। शिक्षा के लिए निर्धारित योजना राशि अन्य जनलुभावनी योजनाओं के लिए डाइवर्ट कर दिया जाता है । विश्वविद्यालय प्रशासन सरकारों के हाथों मजबूर है । राज्य के अधीन विश्वविद्यालयों की वित्तीय हालत बहुत दयनीय है । कई सरकारें विश्वविद्यालयों को ही अपने खर्चे के स्रोतों  ( अपने आंतरिक संसाधनों से ) को तलाशने की सलाह देकर अपना पल्ला झाड रही है ।
नवगठित तेलंगाना राज्य मे विश्वविद्यालयों का हाल बहुत ही चिंताजनक है । लगभग दो वर्षोंसे दस विश्वविद्यालयों मे कुलपति की नियुक्तियाँ नहीं हुई हैं, कुलपति के बिना विश्वविद्यालयी व्यवस्था ठप्प हो गई है । शैक्षिक प्रशासन थम गया है । इस सबी विश्वविद्यालयों को सचिवालय के प्रधान सचिवों के हवाले कर दिया गया है, आई ए एस अधिकारियों को विश्वविद्यालयों का प्रभारी कुलपति बना दिया गया है जो किसी विषेयविद्यालय परिसर मे प्रवेश नहीं करते और अपने अधीन विश्वविद्यालयों का संचालन अपने ही कक्ष में  बैठकर करते हैं । छात्र परेशान हैं, प्राध्यापक परेशान हैं, कोई निर्णय समय पर नहीं हो पाता, प्रीक्षाएँ और अकादमिक गतिविधियां अवरुद्ध हो गई हैं लेकिन किसी को कोई चिंता नहीं है । रह रहकर छात्र आंदोलन कराते हैं, उनकी अनेकों समस्याएँ हैं, किन्तु कोई ध्यान देने वाला जिम्मेदार प्रशासक उपलब्ध नहीं ।
इधर केंद्र मे शोचछात्रों की फ़ेलोशिप को लेकर आंदोलन शुरू हो गया है।  नॉन नेट फ़ेलोशिप को निरस्त करने का विचार सरकार कर रही है जिसके विरोध मे शोधार्थी भड़क उठे हैं । जिस देश मे छात्र और प्राध्यापक वर्ग और शिक्षा तंत्र असंतुष्ट, अपर्याप्त और अव्यवस्थित होगा उस राष्ट्र का शैक्षिक भविष्य क्या होगा ? इसकी कल्पना की जा सकती है । हम अक्सर अपने देश के शिक्षण संस्थाओं को विश्व के प्रथम सौ में कहीं न पाकर दुखी हो जाते हैं लेकिन उनके कारणों की जांच कर उनका समाधान नहीं करना चाहते । सामाजिक असामानता, सामाजिक भेदभाव, वोट बैंक की राजनीति ही हमारी शासन प्रणाली के लिए सबकुछ है । हम चीन से प्रतिस्पर्धा की कल्पना करते हैं किन्तु हम अपने सकाल घरेलू उत्पाद ( GDP ) का केवल दो प्रतिशत ही शिक्षा पर व्यय कर रहे हैं ( लगभग ) ( सही आंकड़ों कि जांच करनी होगी ) वहीं चीन करीब आठ प्रतिशत धन व्यय करता है ।
शोध और उच्च शिक्षा की परीक्षाओं की प्रामाणिकता और गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं । पारंपरिक विश्वविद्यालयों मे स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में मूल्यांकन प्रणाली गंभीर रूप से विचारणीय है । मूल्यांकन प्रणाली  त्रुटिपूर्ण है जो दशकों से चली आ रही है । मनमाने ढंग से उत्तरपुस्तिकाएँ जाँची जाती हैं और अंक दिए जाते हैं जो कि निर्विवाद सत्य है । इस कारण प्रथम श्रेणी और विशेष योग्यताप्राप्त छात्र भी औसत दर्जे के साबित होते हैं ।  साक्षात्कारों में इन छात्रों की योग्यता का पर्दाफाश हो जाता है तो काफी निराशा होती है । शोध उपाधियाँ जब से यूनिवर्सिटी मे अध्यापक वृत्ति  के लिए अनिवार्य कर दी गयी, तब से शोध का स्तर बुरी तरह से प्रभावित हुआ है । यह एक अति महत्वपूर्ण क्षेत्र है जिस ओर शिक्षाविदों का ध्यान जाना चाहिए और तत्काल इसे दुरुस्त करना होगा ।  आज हमारे देश मे कहीं कुछ गुणवत्ता बची है तो वह आई आई एम  और आई आई टी संस्थानों में ही बची है, ऐसा माना जाता है । किन्तु इनकी भी गणना विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्थाओं में नहीं होती, यह विचारणीय है । आज़ादी के बाद हमें उत्तरोत्तर हर क्षेत्र में बेहतर से बेहतर बनाना चाहिए था, किन्तु ठीक इसके उलट हो रहा है । शिक्षा के क्षेत्र मे हमने गुणवत्ता के क्षेत्र मे श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर होने के बजाय श्रेष्ठ से निम्नतम की ओर जा रहे हैं । यह चिंता का विषय है । निजी विश्वविद्यालय और विदेशी विश्वविद्यालय जो कि हमारे देश मे आर्थिक उदारीकरण, बाजारवाद, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति के अंतर्गत जो अपना जाल फैला रहे हैं , वहीं अपेक्षित गुणवत्ता देखी जा सकती है । लेकिन ये विदेशी विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थाएं भीषण रूप से महंगी हैं जिनमें सामान्य व्यक्ति अपने बच्चों को नहीं दाखिल कर सकता ।

Wednesday, November 4, 2015

सहिष्णुता और असहिष्णुता पर बहस और जमीनी सच्चाई -

यह अत्यंत दुखद स्थिति है कि आज देश में एक विचित्र तरह की बहस हो रही । कौन सहिष्णु है और कौन असहिष्णु ? विचारधाराओं  की टकराहट लोकतन्त्र में सामान्य है और होनी चाहिए । सिद्धान्त, मान्यताएँ और और विचाधाराएँ असंख्य होती हैं और सभी मान्यताओं और विचारधाराओं को स्वाभाविक रूप से विकसित होने का माहौल लोकतंत्र की बुनियादी मांग होती है । आपसी खंडन-मंडन किया जा सकता है किंतु इस बौद्धिक प्रतिस्पर्धा में हिंसा एवं प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होता । सत्ता हो या अन्य विपक्षी राजनीतिक दल हों, किसी को जन सामान्य पर हमला करने या जान लेने का अधिकार संसार का कोई भी सभ्य समाज नहीं देता । भारत एक महान सभ्यता है क्योंकि यह अनेक समुदायों का समुच्चय है और इतने वैविध्य वाले लोगों मे कई विषयों पर  मतैक्य असंभव है । परंतु मतभेद का अर्थ किसी पर भी हमला करना नहीं होता । हर सामान्य नागरिक को जीवन जीने का मौलिक अधिकार प्राप्त है जिसे हमारा संविधान पुष्ट करता है । निजी खान-पान, आचार-विचार-व्यवहार की छूट और अधिकार हर नागरिक को इस देश मे प्राप्त है, फिर कोई समुदाय अन्य समुदाय के लोगों पर केवल उस समुदाय विशेष के खान-पान के तौर तरीकों को मुद्दा बनाकर अपने सामुदायिक अथवा वैचारिकता को सिद्ध करने के लिए अराजकता फैलाना कहां का न्याय है ? आज देशवासियों को गाय और गोमांस - का मुद्दा विकराल भयावह शक्ति बनकर आतंकित कर रहा है । इतने बरसों तक यह कभी मुद्दा नहीं बना था, फिर आज क्यों बन गया ? आज तक किसी को पड़ोसी की रसोई मे क्या पाक रहा है, पड़ोसी क्या खाता है, इसकी चिंता कभी नहीं थी । यह कोई बहस का वियशय कभी नहीं था । फिर आज क्यों हो गया ? क्या तथाकथित सत्ता पक्ष  और अन्य लोग भी यह भूल गए हैं हैं की भारत की सांस्कृतिकता बहुआयामी और बहुलतावादी है । मजहब, मान्यताएँ मनुष्य के बनाए होते हैं और ये सिद्धान्त मनुष्य के लिए होते हैं। मनुष्य सिद्धांतों के लिए नहीं होता । मजहब भी मनुष्य के लिए निर्मित एक आस्था है, मनुष्य- मजहब के लिए नहीं होता । मजहब मनुष्य के लिए होता है । मनुष्य की सत्ता, अस्तित्व और अस्मिता इन सबसे ऊपर है, सुप्रीम
है । मनुष्यत्व को ताक पर रखकर धर्म, मजहब के उन्माद में अपनी बात को ज़बरदस्ती मनवाने की कोशिश करना और यदि न मानें तो उन्हें नेस्तनाबूद करने का प्रयत्न करना इस देश के लिए घातक है । ऐसी अवसर पर समाज मे सदभावना और विश्वास पैदा करने के लिए लोकनायक ( जो भी है ) उसे आगे आकार मोर्चा संभालने की आवश्यकता है ।शीर्ष पर बैठे नेताओं का यह कर्तव्य है की जनता में फैले भय और अनिश्चितता की स्थिति को संभालें और ऐसे लोगों को नियंत्रण मे लाएँ जो देश की उदारवादी सांस्कृतिक चेतना को भंग करते हैं, निर्दोष जन सामान्य पर हमले करते हैं और हिंसा का मानौल रचते हैं । विरोश प्रदर्शन के तरीकों पर भी काफी जमकर बहस हो रही है । विरोधी स्वरों पर सवाल किए जा रहे हैं । विरोध सामयिक ही तो होता है, यदि इससे पूर्व की घटनाओं पर, उस समय इस तरह की प्रतिरोध की संस्कृति नहीं पनपी थी तो क्या आज कोई विरोध नहीं कर सकता  क्या ? वर्तमान की स्थितियों पर विचार करने के बदले लोग विरोध करने वालों की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं और उन्हें अपनी क्षिदर राजनीति से जोड़ कर विरोध के महत्व को कमतर आँकने का षडयंत्र रच रहे
हैं । जो भी हो, आज देश मे अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर खतरा तो मंडरा रहा है, इसमें दो राय नहीं है ।
राजनेता सारे के सारे पार्टी लाईन पर ही बहस करते हैं और परस्पर तू तू मैं मैं ही करते रह जाते हैं, एक दूसरे पर कीचड़ उछलने के सिवाय राजनेता जन सामान्य की भावनाओं को समझ पाने में नितांत असमर्थ और असहाय ढंग से पेश आ रहे हैं । नेताओं को धैर्य के साथ जनता की भावनाओं को समझकर उनका साथ देना होगा । जनता और नेता यदि आमने सामने हो जाएँ - तो परस्पर टकराहट ही होगी । और यह टकराहट लोकतन्त्र के लिए घातक है । जनप्रतिनिधि का यह कर्तव्य है की वह अपनी प्रजा के घावों पर मलहम लगाकर उसका उपचार करे, न कि उसके घावों को कुरेदकर उसे अधिक तकलीफ पहुंचाए । 

Wednesday, July 29, 2015

देश के इस सदी के महानायक के निधन से सारा देश शोक संतप्त है -

डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम भारत के सच्चे अर्थों मे महानायक थे/हैं । आदर्श शिक्षक, चिंतक,वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, राजनयिक, अध्येता, कलाप्रेमी, साहित्यप्रेमी, मानवतावादी, महामानव थे वे । ऐसी विभूतियाँ सदियों मे एक बार जन्म लेती हैं और अमर जो जाती हैं । कलाम साहब के लिए मृत्यु एक भौतिक सत्या भले ही हो लेकिन वे देशवासियों के हृदय मे हमेशा हमेशा के लिए अभिन्न होकर रच बस गए हैं । उन्हें हमसे कोई ताकत पृथक नहीं कर सकती । जो व्यक्ति, जिसका अस्तित्व, जिसकी मौजूदगी, शारीरिक से कहीं अधिक रूहानी हो जाए वह किसी से कैसे अलग हो सकता है । इस देश के हर शख्स मे वे बस गए हैं । उनकी आवाज़ देश के किसी न किसी कोने से हर पल सुनाईदेती थी और आगे भी उनकी आवाज़ की अनुगूँज हवाओं मे फिज़ाओं मे सदैव कंपन्न पैदा करती रहेगी । जो उनहमे एक बार दूर से ही सही देख लेता था उन्हें कभी नहीं भूल सकता था, एक बार जो उनहमे प्रत्यक्ष देखे या सुन ले वह उनकी आवाज़ और उनके चेहरे को कैसे भूल सकता है ।उन्मने अपार ऊर्जा कूट कूट कर भारी हुई थी । वे ऊर्जा के पॉवर हाऊस थे । उम्र उनको छू भी नहीं सकी थी । वे निरंतर कार्यरत रहने वाले कर्तव्यनिष्ठ कार्यकर्ता थे । देश के एक सिपाही थे जो देश की तीनों सेनाओं के सेनाध्यक्ष भी थे ( पाँच वर्षों के लिए - राष्ट्रपति पद पर रहते हुए )
उनका जीवन दर्शन अद्भुत था । वे सत्य के पुजारी थे । निराडंबर, निडर, स्पष्टवादी, पारदर्शी, आध्यात्मिक चेतना से युक्त, ईश्वर तत्व मे विश्वास करने वाले, आस्थावान, अपने कर्तव्य और दायित्व के प्रति प्रतिफल जागरूक और सतत परिश्रमी स्वभाव के युगपुरुष थे वे । उनमें कोई भी ऐब नहीं दिखाई देती थी । वे एक ऋषि थे, स्वयं एक साधक थे । सरलता,सादगी और आत्मीयता उनके व्यक्तित्व के आकर्षण थे । देश की युवा पीढ़ी के प्रति वे वीचेश चिंतित रहा कराते थे । बच्चों से विशेष प्यार थी उन्हें । देश को बदलने की ताकत युवा पीढ़ी मे ही वे मानते थे । समाज को बदलने के लिए, समाज मे व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए तीन शक्तियों का उल्लेख वे करते थे- माता,पिता और शिक्षक । गुरु का स्थान अत्यंत पवित्र और पावन होता है।
उनमें उच्च कोटी नायकत्व के लक्षण  विद्यमान थे । कठिन कार्य को स्वीकार करना नायक का लोकसन होना चाहिए । विफलता का दायित्व स्वयं जो लेता हो और सफलता का श्रेय जो साथियों को देता हो वही सच्चा नायक होता है । उनमें यह गुण विद्यमान था ।
मनुष्य का जन्म संसार मे कर्म करने के लिए होता है । निष्क्रिय और निठल्ले बैठे रहने के लिए नहीं होता । कर्मवाद के वे दृढ़ पक्षधर थे । हर व्यक्ति का एक कर्म निर्दिष्ट होता है, कोई कम छोटा या बड़ा नहीं होता । कर्म, कर्म होता है ।  भय को मन से निकाल दो, डरो मत, कभी मत डरो, आगे बढ़ो, विफलता का सामना करना, मुक़ाबला करना सीखो, सफलता मे घमंडी मत बनो । सफलता को भी सही तरीके से स्वीकार करना चाहिए और उसे सही ढंग से आचरण मे लाना चाहिए । विफलता मे निराशा अकर्मण्य और निष्क्रिय बना देती है इसलिए गिरकर पुन: उठो और काम पर लग जाओ - ये कलाम साहब के संदेश हैं । देश के प्रति अप्रतिम लगाव और आत्मीयता उनमें जुनून की हद तक मौजूद थी ।
वे एक कर्मयोगी थे । उनका जीवन अनुकरणीय और चिरस्मरणीय है । उन्हें शत शत नमन शत शत नमन । 

Thursday, September 11, 2014

देश के बुद्धिजीवियों को हिंदी की चिंता नहीं !

यह बहुत ही चिंता  का विषय है कि छात्रों में (स्कूल और कॉलेज ) में भारतीय भाषाओं और हिंदी की संवैधानिक स्थिति के संबंध में ज्ञान पूरी तरह शून्य है । इधर मुझे कई विद्यालयों मे जाने का अवसर मिला । हिंदी के छात्रों को संविधान में हिंदी से संबंधित अनुच्छेदों के बारे में अनभिज्ञता देखकर दुख और आश्चर्य हुआ । हमारे देश के शिक्षित नागरिकों भी इन तथ्यों के बारें जानकारी नहीं । लोग इसे जानना महत्वपूर्ण नहीं मानते। हमारा देश बहुभाषी देश है । संस्कृतिबहुलता इस देश की मूल प्रकृति है । संविधान में 22 भाषाओं का उल्लेख आधिकारिक रूप से आठवीं अनुसूची  में हुआ है । बहुत कम लोगों को इन बाईसों भाषाओं की जानकारी है । अधिक लोग नहीं जानते कि इन बाईस भाषाओं की सूची में अंग्रेजी नहीं शामिल की गई है । जब कि अंग्रेजी साहित्य, भारतीय साहित्य का गौरवशाली हिस्सा है । भारतीय अंग्रेजी लेखन विश्व ख्याति प्राप्त है । चेतन भगत, अनीता देसाई, मुल्कराज आनंद, किरण देसाई, विक्रम सेठ, शोभा डे, खुशवंत सिंह, आदि सुविख्यात भारतीय लेखक अंग्रेजी साहित्य को भारतीय साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया ।
इसके अलावा, लोगों मे इस तथ्य के प्रति भी उदासीनता है कि हिंदी को संविधान मे राजभाषा का ही दर्जा दिया गया है । संविधान मे कहीं भी हिंदी के लिए 'राष्ट्रभाषा ' शब्द का प्रयोग ही नहीं किया गया है। यह बहुत बड़ी त्रुटि है या सरकार (संविधान समिति की ) 'नीति ' - इसका खुलासा कहीं नहीं हुआ है जो कि कष्टदायक है और विवादों को जन्म देने वाला हथियार है । देशवासियों को भावनात्मक स्तर पर इसे राष्ट्रभाषा स्वीकार करने की अपेक्षा करना 'तकनीकी ' दृष्टि से सही नहीं लग सकता है । ऐसे तर्क की गुंजाईश तो है । वैसे आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी 22 भाषाएँ राष्ट्रीय भाषाएँ ही हैं, लेकिन हिंदी ही राष्ट्रभाषा  कहने का कोई मजबूत तर्क नहीं दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि देश के कई लोग इसे वैसे राष्ट्रभाषा मानने से इनकार करते हैं । संविधान का अनुच्छेद 351 - जो कि एक निर्देश है - में देश में हिंदी को प्रमोट करने के लिए निर्देश दिए गए हैं साथ ही इसमें हिंदी के स्वरूप को परिभाषित किया गया है । जो कि (1) सरल (2) हिन्दुस्तानी हो (3) सामासिक संस्कृति का प्रतीक हो (4) शब्द भंडार की समृद्धि - मूलत: संस्कृत और गौणत: अन्य भाषाओं से शब्द लिए जाएँ । ये निर्देश ही हिंदी को स्थूल रूप से राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने की ओर संकेत मात्र करता  है । हिंदी के स्वरूप को हिन्दुस्तानी रखने पर इस अनुच्छेद में बल दिया गया है ।
एक और महत्वपूर्ण सत्य/तथ्य की ओर ध्यान नहीं जाता है - अनुच्छेद 348 - जो न्यायपालिका की भाषा को निर्धारित करता है । इसके अनुसार न्यायपालिका और  संसद की भाषा अंग्रेजी होगी । ( कामकाज की भाषा ) । यह बहुत ही विचित्र है । भारत जैसे देश में जहां अंग्रेजी एक विदेशी भाषा है चाहे इसकी क्षमता दुनिया को जीतने की ही क्यों न हो, भारत के लिए तो यह एक विदेशी भाषा ही है और रहेगी। कोर्ट कचहरियों में कामकाज इसीलिए अंग्रेजी में ही होता है । इसीलिए कोई भी आम भारतीय कचहरी में अपना मामला ले जाने के लिए डरता है । फैसला भी नगइनत पृष्ठों मे अंग्रेजी में दिया जाता है जिसे समझने के लिए वकीलों को बड़ी रकम देनी पड़ती है ।  हिंदी को हालाकि संविधान के  अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा घोषित किया गया है (देवनागरी लिपि और अंतर्राष्ट्रीय अंकों के साथ ) फिर भी इसके साथ अंग्रेजीमें कामकाज करने की छूट का भी प्रावधान बहुत ही होशियारी से जड़ दिया गया है । यह अंग्रेजी वाली शर्त केवल 15 वर्षों के लिए थी, किन्तु इसे भी हमेशा के लिए  बढ़ा दिया गया । इसीलिए मूलत: राजभाषा के रूप में भी केवल खानापूरी कर रही है और अंग्रेजी मूल राजभाषा बनकर राज कर रही है । संविधान के अनुच्छेदों में ऐसे कई विरोधाभास हैं कि उन्हें समझने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है और अंत में जो बात समझ में आती है वह यही कि हमें अंग्रेजी में कामकरने की संवैधानिक छूट मिली हुई है । ( इसमें कोई दो राय नहीं )।
राजभाषा हिंदी कार्यान्वयन में उलझनें पैदा करने के लिए कई समितियां, उपसमितियाँ, आयोग, बनाए गए हैं । इनके नियम समयसमय पर संशोधित होते रहे हैं जिस कारण वर्तमान में लागू नियमों या अधिनियमों के बारेमें स्पष्ट जानकारी हासिल करना असंभव है ।
एक और विडम्बना यह भी है कि राजभाषा कार्यान्वयन का काम केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है जब कि संसाधन जुटाने और हिंदी प्रशिक्षण एवं हिंदी की अन्य गतिविधियों को प्रमोट करने का दायित्व मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सौंपा गया है । इसमें भी काफी भ्रामक स्थितियाँ हैं । केंद्रीय हिंदी निदेशालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान और वैज्ञानिक एवं तकनीकी भाषा आयोग, केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो - ये सभ मानव संसाधन विकास के आढ़ें हैं । देश भर के केंद्र सरकार के कार्यालय, बैंक और उपक्रम - ये गृह मंत्रालय के अंतर्गत राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयन के लिए बाध्य हैं ।
एक सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि हिंदी राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है बल्कि यह केवल एक तबके का सिर दर्द बनकर रह गया है और वह तबका है - हिंदी पढ़ने लिखने वालों का और हिंदी पढ़ाने वालों का । इनके सिवाय कोई हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के संबंध में न सोचता है और न ही इस राष्ट्रीय समस्या/मुद्दा मानता है । इस ओर समूचे देश को सोचना होगा ।
एम वेंकटेश्वर

Thursday, September 4, 2014

शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ और सह - प्राध्यापकों को अभिवंदन

मैं अपने देश भर के सभी प्राध्यापक साथियों की सेवाओं के प्रति नतमस्तक होता हूँ जो अपने जीवन को अध्यापन के इस श्रमपूर्ण कठिन दायित्व के निर्वाह के लिए कटिबद्ध हैं ।
- एम वेंकटेश्वर  

शिक्षक दिवस की प्रासंगिकता

5 सितंबर का दिन भारतीय शिक्षकों के सम्मान का दिन होता है । भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ  राधाकृष्णन के जन्म दिन को उन्होंने स्वयं देश के शिक्षकों को समर्पित कर  दिया था । यह शिक्षकों के प्रति उनके सम्मान और आदर की भावना का द्योतक है । वे स्वयं एक उत्तम शिक्षक थे । वे अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर थे और देश कई विद्यालयों मे उन्होंने अध्यापन कार्य किया था । वे एक विश्वस्तरीय दार्शनिक, अध्यात्म दर्शन के प्रकांड पंडित, अंग्रेजी साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान, सुलझे हुए राजनयिक और संस्कृत भाषा के साथ वेद-वेदांगों के उद्भट ज्ञानी थे । वे एक कुशल और गम्भीर वक्ता के रूप मे विश्व भर मे पहचाने जाते थे । विश्व के अनेक महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों और समारोहों मे उन्होंने अपने चिंतनपूर्ण दार्शनिक व्याख्यानों से बुद्धिजीवियों को प्रभावित किया । वे एक आदर्श शिक्षक थे ।शिक्षकों के लिए आदर्श आचार संहिता के अनुपालन पर उन्होंने सदैव बल दिया । शिक्षक समाज का आदर्श व्यक्ति होता है, होना चाहिए। प्राचीन काल की गुरु शिष्य परंपरा मे गुरुओं के आश्रम मे रहकर विद्यार्जन किया जाता था । जीवन मे चारों आश्रमों का पालन किया जाता था । ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम । ब्रह्मचारी आश्रम केवल विद्याध्यन के लिए और ज्ञान अर्जन के लिए निर्णीत था। गुरु का स्थान और महिमा ईश्वर तुल्य माना जाता था । गुरु से ज्ञान प्राप्त कर व्यक्ति (शिष्य ) आजीविका की व्यवस्था करता और फिर विवाह करके गृहस्थ मे प्रवेश करता था । ज्ञानार्जन की यही भारतीय परंपरा सदियों से चली आई । आधुनिक युग में भी गुरु, शिक्षक के रूप मे परिवर्तित हुआ क्योंकि शिक्षक एक वेतन भोगी कर्मचारी बन गया किन्तु उसके जीवन के आदर्श वही हैं । आचार संहिता भी वही होनी चाहिए । आज हमारे देश मे शिक्षा का क्षेत्र संकटापन्न स्थितियों से गुजर रहा है ।  पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली ने देश की संस्कृति और सोच को बदलकर उपभोक्तावादी संस्कृति मे तबदील कर दिया है जिसका  दुष्परिणाम हमारे सामने मौजूद है । राष्ट्रीय चरित्र, नैतिक मूल्य, मानवीय संवेदनाएँ लुप्त होती जा रही हैं । शिक्षा का स्तर अपेक्षित लक्ष्य से कहीं दूर भटक गया है । हमारे देश के सर्वोत्तम शिक्षण संस्थान विश्व पटल पर प्रथम सौ मे स्थान नहीं पा रहे हैं । सरकारों की सतत परिवर्तनशील नीतियाँ और अन्य सामाजिक और राजनीतिक अराजकता के कारणों से देश की शिक्षा व्यवस्था मे एकरूपता का अभाव है और गुणवत्ता का ह्रास निरंतर होता जा रहा है । यह एक गहन चिंता का विषय है । शोध का क्षेत्र सबसे अधिक मूल्यहीनता और गुणात्मक ह्रास का शिकार हो गया है । शिक्षक दिवस हमें अपने कर्तव्यों का स्मरण कराता है । शिक्षकों के चरित्र निर्माण पर बल देता है । शिक्षक एक सेवक होता है । उस पर समूची बाल एवं युवा पीढ़ी के भविष्य के निर्माण का दायित्व टीका होता है । छात्रों मे राष्ट्रीय भावना/चेतना के विकास का दायित्व शिक्षक पर ही होता है इसलिए उसे स्वयं पहले इन मूल्यों को आत्मसात करना चाहिए । निष्पक्षता, नि:स्वार्थता, ईमानदारी, कर्मठता, कर्तव्यनिष्ठा, परिश्रम और दृढ़ संकल्प जैसे गुणों को सर्वप्रथम शिक्षक को अपने आप में विकसित करना चाहिए । यह तभी संभव है जब शिक्षक में उपर्युक्त मूल्यों के प्रति आस्था  होगी ।
आज हमें ऐसे शिक्षकों की नितांत आवश्यकता है जो नि:स्वार्थ भाव से अपना सर्वोत्तम छात्रों को दे सकें। ऐसे प्राध्यापक जो निरंतर अध्ययनशील हों, जो सर्वप्रथम अपने ज्ञान की सीमाओं का विस्तार प्रतिफल कराते रहें, जिससे कि अपने विद्यार्थियों में वे अद्यतन ज्ञान  का प्रसार कर सकें। उनमें अधिक से अधिक काम करने की ऊर्जा और शक्ति कायम रहे, जो बिना शर्त अपनी सेवाएँ शिक्षा क्षेत्र को दे सकें । कठिन से कठिन दायित्व को स्वीकारने की क्षमता जिनमें मौजूद हो, जो स्वयं असाधारन प्रतिभा संपन्न हो और जो निर्भीक हो, अनुशासनप्रिय हो, भ्रष्ट नीतियों और भ्रष्ट प्रलोभनों से विचलित न हो, जिसमें समन्वय का गुण हो, जो लोगों को जोड़ने मे विश्वास करता हो, जिसमें देश के प्रति अटूट श्रद्धा हो, जो स्त्रियों का सम्मान करता हो और स्त्री सशक्तिकरण की प्रक्रिया को बल और समर्थन दे सके । आज हमें ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है ।  
आइए शिक्षक दिवस के इस पावन पुनीत अवसर पर हम समवेत होकर यह संकल्प करें कि हम शिक्षक गण उपर्युक्त मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध होंगे । हम तैयार हैं चुनौतियों का सामना कर, भ्रष्ट शक्तियों से लड़ने के लिए और देश मे एक सुव्यवस्थित मूल्यवान शिक्षण व्यवस्था के निर्माण के लिए ।  शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ सारे देशवासियों को । मैं एक शिक्षक हूँ और मेरा जीवन उपर्युक्त मूल्यों के संवर्धन तथा परिरक्षण मे ही बीत रहा है ।