Monday, July 18, 2016

                   नवजागरण के परिप्रेक्ष्य में भारत की भाषाई अस्मिता                                                                                                          डॉ  एम वेंकटेश्वर

नवजागरण एक विश्वव्यापी सामाजिक और सांस्कृतिक अवधारणामूलक क्रान्ति थी जो समूचे उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से बीसवीं शताब्दी के अंत तक विश्व के विभिन्न समाजों में निरंतर क्रियाशील रही । विश्व के सभी हिस्सों में इस क्रान्ति ने, सभ्यताओं को मध्ययुगीन जीवन विधान और चिंतन परंपराओं से मुक्त कर, आधुनिकता की नींव राखी ।  आधुनिकता और आधुनिक बोध ने मनुष्य की सामाजिकता को नए ढंग से परिभाषित किया । मानवीय सभ्यता को मध्ययुगीन रूढ़िवादी चिंतन की सरणियों से निकालकर आधुनिक चिंतन और नवीन जीवन विधान में अंतरित करने वाली महाशक्ति का नाम ही नवजागरण है । भारतीय  संदर्भ में नवजागरण, पुनर्जागरण अथवा नवोत्थान की परिकल्पना अत्यंत व्यापक धरातल पर की गई । भारतीय नवजागरण का मुख्य लक्ष्य इस भूखंड की सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना में क्रांतिकारी बदलाव लाना था । भारतीय नवजागरण की प्रक्रिया एक उभरते हुए शक्तिशाली आंदोलन के रूप में भारत के विस्तृत भूभाग में शनै: शनै: व्याप्त हुई । यह एक निर्विवादित सत्य है कि इसका उद्गम स्थान बंगाल की वह बौद्धिक उर्वरा भूमि है, जहां सर्वप्रथम नवजागरण का शंखनाद घोषित हुआ । भारतीय नवजागरण आंदोलन का सूत्रपात बंगाल में हुआ और इसके सूत्रधार थे राजा राममोहन राय । इस आंदोलन ने भारत की वहुभाषिक, संस्कृति-बहुल भौगोलिकता और सामाजिकता में भावनात्मक स्तर पर समूचे उपमहाद्वीप को  एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया । प्राचीन काल से भारत एक बहुसांस्कृतिक देश रहा है । यहाँ एक ही महान परंपरा न होकर कई महान परंपराएँ विकसित हुईं, इनके बीच टकराहट, अंत:क्रिया और आदान-प्रदान का इतिहास उतना ही पुराना है, जितनी पुरानी स्वयं भारतीय संस्कृतियाँ हैं । भारतीय संस्कृति एक विराट समष्टिगत संस्कृतियों के मेल से निर्मित  समुच्चय है । उसमें अखंडता है, पर एकरूपता नहीं है । भारतीय भाषाओं का पुनरुत्थान और उनको अपनी जमीन पर पुन:प्रतिष्ठित करने का संघर्ष भी नवजागरन आंदोलन का महत्वपूर्ण उपक्रम रहा है । नवजागरण आंदोलन के अंतर्गत हिंदी को स्वाधीन भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य भी प्रमुख रूप से परिलक्षित होता है । हिंदी एवं इतर भारतीय भाषाओं के प्राचीन वैभव एवं महानता को पुनर्जीवित करने के उद्यम को ही हिंदी नवजागरण की संज्ञा दी गई । नवजागरण के अनेक लक्ष्यों में भारतीय भाषाओं को उनकी अधिकृति जमीन पर पुन: प्रतिष्ठापित करने का प्रयोजन प्रमुख है, क्योंकि अंग्रेजी ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की जमीन को अनधिकृत रूप से हथिया लिया । अंग्रेजी की साम्राज्यवादी आचरण को भारत के कुछ पराजित मानसिकता के सत्ता लोलुप शक्तियों ने बढ़ावा दिया जिससे भारतीय भाषाओं की अस्मिता को अंग्रेजी ने कुचल दिया । हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी के बंधन से मुक्त करने का आंदोलन ही हिंदी नवजागरण का प्रधान उद्देश्य है । हिंदी स्वाधीनता से पूर्व ही समस्त भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली सर्वसमावेशी भाषा के रूप में स्वीकृत हो चुकी थी । आधुनिक युग में हिंदी, वैविध्यपूर्ण भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है । हिंदी, भारतीय संस्कृति का एक गौरवशाली अंग है । यह एक अविशुद्ध, मिश्रित और बहुरेखीय संस्कृति को अभिव्यक्त करती है ।
किसी भी जाति अथवा समाज में उस समुदाय की विशिष्ट भाषिक संस्कृति का भी विकास होता है । हर समाज में भाषाएँ काल सापेक्ष ढंग से अपनी अपनी भाषिक संस्कृति को विकसित करती हैं जिसके द्वारा देश, काल और परिस्थितियाँ उसमें प्रतिबिंबित होती हैं । हिंदी भाषा की इसी प्रवृत्ति को ‘ हिंदी संस्कृति ‘ की मान्यता प्राप्त है ।  हिंदी संस्कृति की एक प्रमुख विशेषता है, व्यापक भारतीय जीवन से उसकी अखंडता । एक दूसरी विशेषता  है, बाहर की संस्कृतियों और नवोन्मेषों से उसका संबंध ।  इस विषय में वृहत्तर हिंदी समाज में सामान्यत: तीन तरह की प्रतिक्रियाएँ हुईं हैं – आत्मसंकुचन, संवेशिकता और आत्मविसर्जन । भारतीय जीवन की साझी विरासत से जुड़ी हिंदी संस्कृति के इतिहास में परस्पर विरोधी ये तीनों प्रवृत्तियाँ प्रारम्भ से विद्यमान हैं । हिंदी समाज में आत्मसंकुचन से अभिप्राय है उनका अपनी स्थानीय पर्णपराओन में जीना, उनकी समावेशिकता दरअसल उनकी उदारता, नई नई चीजों की ग्रहणशीलता और रूपान्तरण की क्षमता है । आत्मविसर्जन का अर्थ है अपनी पहचान खोकर साम्राज्यवाद का औज़ार बन जाना, भूमंडलीकरण के विश्वव्यापी दुष्प्रभाव को सहर्ष स्वीकार कर लेना। हिंदी संस्कृति की पहचान का अर्थ है, आत्मसंकुचन, समावेशिकता और आत्मविसर्जन के परस्पर तनावों के मध्य संतुलन और समन्वय की स्थिति को विकसित करना है । आज जब धर्मांधता और वैश्वीकरण अपने अपने ढंग से इतिहास का बोध  नष्ट करने पर तुले हैं, विविधताओं से भरी हिंदी संस्कृति की पहचान एक अवधारणात्मक ही  नहीं, सामाजिक आवश्यकता भी बन जाती है । हर समाज और जाति की अपनी स्वतंत्र आकांक्षाओं और सामाजिक जरूरतों के अनुरूप अपनी एक विशिष्ट संस्कृति होती है । भारत का हिंदी प्रदेश,   मुख्यत: बिहार, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली झारखंड और उत्तरांचल को ही माना जाता है  किन्तु इन प्रदेशों के बाहर भी हिंदी समाज विस्तरित है ।इन सबका एक भिन्न सांस्कृतिक गठन है । हिंदी भाषी लोगों का, भारत के अन्य समाजों के साथ घुल-मिलकर रहने का एक सुदीर्घ इतिहास है । हिंदी प्रदेशों में भी जनपदीय स्तर पर कई लघु संस्कृतियाँ मौजूद हैं जिनमें सांस्कृतिक विषमताएँ भी मौजूद हैं ।  किसी भी वृहदाकार समाज में भाषा, आचार-विचार, व्यवहार, रहन-सहन रीति-रिवाज आदि में विविधता स्वाभाविक है ।
हिंदी संस्कृति की अस्मिता जिसे स्वाधीनता के काल से ही राष्ट्रीय अस्मिता का निर्विवादित  स्वरूप धारण कर लेना चाहिए था, इसका वास्तविक स्वरूप आज भी धुंधला है, इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है ?  भारत की भाषाई अस्मिता का स्वरूप आज तक स्पष्ट नहीं हो सका है, इसके लिए इस देश की बहुभाषिक भौगोलिकता को दोष दिया जाता है । हिंदी संस्कृति से जुड़ी हुई एक और विडंबनापूर्ण धारणा यह है कि इसे हिंदू संस्कृति मान लिया जाता है और कट्टर- परंपरावादी बताया जाता है । हिंदी केवल हिंदुओं की भाषा या अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है बल्कि यह लाखों गैर हिंदू समाजों के विशाल जनसमूह के व्यवहार की भाषा है । हिंदी संस्कृति की पहचान के विषय में अक्सर निषेधात्मक रवैया अपनाया जाता है, जो अंग्रेजी मानसिकता की आभिजात्यवादी श्रेष्ठता-ग्रंथि की देन है । पश्चिमी संस्कृति की मादकता को पोषित करने वाला एक वर्ग हिंदी को राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक स्वीकार करने की स्थिति में नहीं दिखाई देता ।  इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि हिंदी संस्कृति एक दमित संस्कृति बन गई । भाषा के पश्चिमी मानकों और अंग्रेजी के महा-वर्चस्ववाद ने हिंदी भाषा की सांस्कृतिक जड़ों में जहर फैला दिया । आज़ादी के पहले से ही नहीं बल्कि पिछले लगभग एक हजार वर्षों में हिंदू और मुस्लिम शासकों की स्वेच्छाचारिता, औपनिवेशिक दमन, संप्रदायवाद और वैश्वीकरण के प्रहार से हिंदी संस्कृति सबसे ज्यादा आहत हुई है । मध्ययुगीन अराजक राजनीति और आधुनिक युगीन पश्चिमी भाषा-संस्कृति के मोह ने हिंदी संस्कृति की समन्वय की भावना को छिनभिन्न कर दिया । यह एक युगीन सत्य है कि आजादी के बाद भारत में बुद्धिजीवी वर्ग ने हिंदी के प्रति निषेधात्मक दृष्टिकोण को अपनाया ।  
नवजागरण काल में हिंदी को जनमानस में स्थापित करने के जो प्रयास किए गए उन्हें आज़ादी के बाद एक तरह से उलट दिए गए । इस संदर्भ में आर्य समाज की सुधारवादी लहर, किसानों और मजदूरों के आंदोलन, आदि के माध्यम से राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलैन में तेजी आई ।  दयानंद सरस्वती और बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी आदि ने हिंदी को प्रमुखता दिलाने के लिए, उसे भविष्य में स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बनाने के लिए, स्वयं हिंदी सीखकर उसे अपनाया और देश भर में उसे प्रचारित किया । दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना हिंदी में कि न की गुजराती अथवा अंग्रेजी में । मद्रास के सी वी राजगोपालाचारी ने हिंदी को मातृभाषा सदृश अपनाया और मद्रास में प्रथम हिंदी माध्यम का विद्यालय खोला, जिसे गांधीजी ने सराहा और इसे समस्त देशवासियों के सम्मुख प्रेरणा स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया । हिंदी संस्कृति में सहिष्णुता और सामंजस्य की सृजनात्मक परंपरा बहुत पुरानी और काफी मजबूत है ।
साठ के दशक में हिंदी प्रदेश में अंग्रेजी के विरोध में हिंदी के लिए सशक्त आन्दोलन छिड़ा था, जिसने दक्षिणी प्रांतों के लोगों के मन में ‘उत्तर भारत के भाषिक साम्राज्यवाद ‘ के प्रति आक्रोश पैदा कर दिया था । वह आंदोलन विध्वंसक अधिक था, क्योंकि उसके पीछे भाषा प्रश्न पर सही सोच की जगह उत्तेजना ज्यादा थी । उसका कोई खास नतीजा भी नहीं निकला । हिंदी के साथ  साथ  अन्य भारतीय भाषाओं की अस्मिता भी अंग्रेजी, अंग्रेजीयत और पाश्चिमी अपसंस्कृति तेजी से निगलती जा रही है । हिंदी भाषियों के नव समृद्ध वर्ग ने हिंदी को तिलांजलि दे दी है । उसने हिंदी का प्रयोग सामान्य और विशेष, दोनों प्रयोजनों  के लिए करना छोड़ दिया है । शिक्षा माध्यम का अंग्रेजीकरण और अन्य भारतीय भाषाओं के विकास में न केवल बाधक बन गया है बल्कि  भारत की भाषाई अस्मिता अंग्रेजी के कारण खतरे में पड़ गई है  जिस ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है । संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल बाईस भाषों में एक के बाद एक मैथिली, राजस्थानी को शामिल किया जा रहा जो हिंदी का ही एक रूप मानी जातीं रहीं हैं । हिंदी साहित्य के इतिहास में मध्य-युगीन हिंदी साहित्य के अंतर्गत, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी, डिंगल, पिंगल आदि सभी को हिंदी ही माना गया और तुलसीदास की अवधी में रचित रामचरितमानस, बरवै रामायण, विनय पत्रिका, आदि को हिंदी साहित्य के रूप में सदियों से मान्यता प्राप्त है । इसीलिए तुलसीदास को हिंदी का ही माना गया है, उसी प्रकार सूरदास द्वारा  ब्रज भाषा  में रचित सूरसागर, भ्ररगीत, साहित्य लहरी रचनाओं को हिंदी साहित्य के अंतर्गत ही स्थान दिया गया है । कबीर, जायसी, विद्यापति, बिहारी, घनानन्द, सेनापति, मीरा आदि की ब्रज और अवधी में रचित काव्य साहित्य को हिंदी साहित्य की ही संज्ञा प्रदान की गई है किन्तु इन उपभाषाओं को स्वतंत्र भाषाएँ घोषित कर उन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने से उनका अस्तित्व हिंदी से पृथक हो जाने के कारण  हिंदी का समावेशी स्वरूप ध्वस्त हो रहा है । इस तरह हिंदी की अस्मिता खतरे में पड़ रही है ।  यह गहन चिंता का विषय है कि भारत की कोई भाषिक अस्मिता आज तक न तो स्थापित हो सकी है और न ही स्थिर हो पाई है । भारतीय भाषा के रूप में हम किस भाषा को राष्ट्रीय अस्मिता का चिह्न मानेंगे ? यह आज भी विवादास्पद है तथा इस विषय पर कोई एक राय देशवासियों में नहीं है । हम राष्ट्र के रूप में सन् 1947 में अवतरित तो हुए और संवैधानिक तौर पर हमने सार्वभौमिकता और संप्रभुता भी 1950 में हासिल कर ली किन्तु संवैधानिक दृष्टि से हम देश की भाषिक समस्या में उलझ गए और यह एक गुंजलक की भांति समय के साथ और अधिक उलझता  ही जा रहा है । किसी भी राष्ट्र की अस्मिता उसकी एक सर्वस्वीकृत राष्ट्रभाषा से ही मान्यता प्राप्त करती है, और राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय धरातल पर वह समादृत होकर राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है । किन्तु भारत ऐसी सर्वमान्य भाषिक अस्मिता को धारण ही नहीं कर पाया है ।  हिंदी को राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक और राजचिह्न बनाया जा सकता है बशर्ते कि समस्त देशवासी एकस्वर में बिना किसी मतभेद के इसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लें । भारतीयों की मातृभाषाओं को अक्षुण्ण एवं सुरक्षित रखते हुए इस कल्पना को साकार किया जा सकता है । राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र के हित में देशवासियों को राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा हेतु  परस्पर भाषाई विभेदों को दूर कर हिंदी को साधारण बोलचाल के साथ साथ, शिक्षा के माध्यम, कामकाज, रोजगार, व्यापार-वाणिज्य, प्रबंधन, जनसंचार के लिए भारतीय राष्ट्रीय भाषा  का दर्जा संवैधानिक तौर पर स्वीकार करना होगा तभी देश की भाषिक समस्या का समाधान संभव है ।
आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी आधुनिक युग के हिंदी नवजागरण के पुरोधा माने जाते हैं । उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा, की पत्रिका ‘सरस्वती ‘ के संपादक के रूप में हिंदी नवजागरण का बीड़ा उठाया और  निरंतर   हिंदी को राष्ट्रीय अस्मिता के लिए अनिवार्य सिद्ध करने का अभियान चलाया । उनके अनुसार अंग्रेजी ने सभी भारतीय भाषाओं के अधिकार छीने हैं, इसलिए प्रत्येक भारतीय भाषा को अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करना ही पड़ेगा, इस संघर्ष में हिंदी को प्राथमिकता और वरीयता प्रदान करनी होगी । गांधीजी भारतीय भाषाओं के प्रबल समर्थक थे । उन्हें भी अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी और गुजराती बोलने के लिए कई बार अपमानित होना पड़ा था ।  इसका वर्णन जनवरी 1918 की ‘सरस्वती’ में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा  ‘ गांधीजी के मातृभाषा प्रेम का एक उत्कृष्ट उदाहरण ‘ शीर्षक टिप्पणी में किया गया है ।  इस टिप्पणी के आरंभ में पहले मातृभाषा और राष्ट्रभाषा, इन दोनों के संबंध पर ध्यान देना आवश्यक है । द्विवेदीजी ने लिखा है – “ गांधीजी मातृभाषा के कितने प्रेमी और हिंदी प्रचार के कितने  पक्षपाती हैं, यह बात उनके लेखों और वक्तृताओं से अच्छी तरह प्रकट होती है । इस बात को देशोद्धार और देशोन्नति का प्रधान साधन समझते हैं। यही राय अनेक देशभक्तों की है । पर औरों की राय से गांधीजी की राय बहुत महत्व रखती है; क्योंकि गांधीजी के जीतने काम होते हैं, उनके गंभीर विचारों के निष्कर्ष के आधार पर होते हैं । बिना खूब गहरा विचार किए, बिना दूर तक सोचे, बिना परिणाम पर अच्छी तरह ध्यान दिये, वे न कोई राय ही कायम करते हैं और न कोई काम ही करते हैं । इसी से उन्हें अपने प्रयत्नों और उद्योगों में कामयाबी होती है । वे बड़े विवेकशील हैं । अतएव जब वे यह कहते हैं कि देश के पुनरुद्धार की चेष्टा करने वालों को मातृभाषा का पक्षपाती और प्रेमी होना चाहिए तब मन यही कहता है कि उनका कथन अवश्य सच होगा । “ 1
गांधीजी के मातृभाषा प्रेम से द्विवेदीजी को कष्ट नहीं होता । वे इस बात का प्रचार नहीं करते कि गुजराती बंधुओं के मातृभाषा प्रेम से राष्ट्रभाषा (हिंदी ) का अहित होगा । इसके विपरीत वे गांधीजी के गुजराती प्रेम को हिंदी-भाषियों एवं समर्थकों के लिए अनुकरणीय उदाहरण बनाकर प्रस्तुत करते हैं । गांधीजी ने गुजराती भाषा में जेल के अपने अनुभवों का वर्णन करते हुए एक पुस्तका लिखी थी । उसमें एक घटना का वर्णन इस प्रकार है –
“ निष्क्रिय प्रतिरोध के कारण जब वे एक बार दक्षिणी आफ्रिका के एक जेल में थे तह उन्हेमुंकी धर्मपत्नी की बीमारी का सूचक तार मिला । यदि वे जुरमाना भर देते तो उन्हें जेल से छुटकारा मिल जाता और वे अपने घर अपनी पत्नी के औषधोपचार आदि का प्रबंध कर सकते । पर ऐसा करना उन्होंने अपने सिद्धान्त के प्रतिकूल समझा । अतएव जेलर की आज्ञा प्राप्त करके अपनी पत्नी को उन्होंने गुजराती में एक पत्र लिखा । इस पत्र को देखकर जेलर चौंका, क्योंकि वह उसे पढ् न सका । खैर, उसे तो उसने जाने दिया, पर हिदायत दी कि गांधीजी अपने अगले पत्र अंग्रेजी में लिखें । गांधीजी ने कहा, मेरे हाथ के गुजराती पत्र, इस बीमारी की दशा में, मेरी पत्नी के लिए दवा का काम देंगे । इस कारण, आप मुझे गुजराती में ही लिखने की आज्ञा दीजिए । पर जेलर ने न माना । फल यह हुआ कि गांधीजी ने अंग्रेजी में लिखने से इनकार कर दिया । मेरी रोगाक्रांत और आसन्न-मरण पत्नी को मेरे पत्र मिलें चाहे न मिलें, पर मैं अंग्रेजी में उन्हें पत्र न लिखूंगा । ऐसे दृढ़ प्रतिज्ञ और ऐसे मातृभाषा-भक्त को इंदौर के आठवें सम्मेलन ने अपना सभापति बनाकर बहुत ही अच्छा किया है । “2    
गांधीजी का यह उदाहरण आज भी अनुकरणीय है । मातृभाषा प्रेम से ही हिंदी के प्रति राष्ट्रीय अस्मिता का भाव जाग सकता है । मातृभाषाओं की उपेक्षा से ही भारात की भाषाई अस्मिता खतरे में पड़  गई है ।
राष्ट्रभाषा के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के महत्व पर ज़ोर देते हुए माधव राव सप्रे ‘ राष्ट्रीयता की हानि के कारण ‘ लेख ( सरस्वती 1917 ) में कहा था – “ अंग्रेजी भाषा के अधिक प्रचार और देशी भाषाओं के अनादर से राष्ट्रीयता की जो हानि हो रही है उसका पूरा वर्णन करना कठिन है । “ 3 इसीलिए अंग्रेजी की जगह भारतीय भाषाओं कि शिक्षा का माध्यम बनाना आवश्यक था । यहाँ कहीं यह नहीं कहा गया कि अंग्रेजी का स्थान केवल हिंदी ही ले; यह संघर्ष अंग्रेजी के विरुद्ध समस्त भारतीय भाषाओं संघर्ष था । इसलिए आगे कहा गया – “ जब तक अंग्रेजी भाषा का अनावश्यक महत्व न घटाया जाएगा और जब तक शिक्षा का द्वार देशी भाषाओं को बनाकर वर्तमान शिक्षा पद्धति में उचित परिवर्तन न किया जाएगा तब तक ऊपर लिखी गई बुराइयों से हमारा छुटकारा नहीं हो सकता । “ 4
यहाँ इस ऐतिहासिक तथ्य का उल्लेख करना आवश्यक है कि आज़ादी से पूर्व के देशी भाषा के ये आंदोलनकारी  कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थी कि स्वाधीन भारत के संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा ही नहीं दिया जाएगा, यहाँ तक कि पूरे संविधान में कहीं भी राष्ट्रभाषा शब्द का प्रयोग ही नहीं किया जाएगा । हिंदी को अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा घोषित किया गया है किन्तु इसे कहीं भी राष्ट्रभाषा की संज्ञा नहीं दी गयी, इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है ? वे देशी भाषाओं को उचित अधिकार देने के विरोध में अधिकतर अंग्रेज़ और कुछ भारतीय भी यही कहते थे कि इन भाषाओं में पढ़ने-पढ़ाने लायक किताबें नहीं हैं । भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा के उपयुक्त पाठ्य सामग्री तभी तैयार होगी जब विषय विशेषज्ञ लेखक अंग्रेजी में लिखना त्यागकर हिंदी और इतर भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान की सामग्री का लेखन करें । इसीलिए माधव सप्रे ने लिखा, “ संसार के अग्रगण्य वैज्ञानिकों में भारतवर्ष के सुप्रसिद्ध अध्यापक जगदीशचंद्र बसु भी हैं । वे अपने सभी आविष्कारों का वर्णन अंग्रेजी में भाषा में करते हैं और ग्रंथ लेखन भी उसी भाषा में । यदि वे बांग्ला भाषा का उपयोग करने लगें तो देशी भाषाओं में वैज्ञानिक ग्रन्थों का आंशिक अभाव दूर हो सकता है । “ 5
भारतीय ज्ञान-विज्ञान की आधुनिक परंपरा का विकास अंग्रेजी भाषा में ही हो रहा है । भारतीय विशेषज्ञ विदेशी विद्वानों से वैचारिक आदान-प्रदान के लिए अंग्रेजी में ही अपने ज्ञान का प्रसार कर रहे हैं जो कि भारत की राष्ट्रीय अस्मिता तथा राष्ट्रीय गौरव पर प्रश्न चिह्न लगाती है । भारतीय भाषाओं की सृजन शक्ति का अधिकतम अनुपात केवल साहित्य सृजन में  ही व्यय होता जा रहा है । यह गौरतलब है कि प्रथम महायुद्ध के समय से अनेक भारतीय विद्वान इस बात के लिए आंदोलन करते आए थे कि वैज्ञानिक पुस्तकें इस देश की भाषाओं में लिखी जाएँ । यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है । इस दिशा में साठ के दशक में सुप्रसिद्ध मराठी भाषी भौतिक वैज्ञानिक गुणाकार मुले का चालीस से अधिक भौतिक विज्ञान एवं गणित के ग्रन्थों का हिंदी में मौलिक सृजन उल्लेखनीय है । इस आंदोलन को तीव्र रूप में चलाना आवश्यक है । यह ध्यातव्य है कि महावीरप्रसाद द्विवेदी, माधवराव सप्रे, महात्मा गांधी आदि लेखक और राजनीतिज्ञ समस्त भारतीय भाषाओं की अस्मिता और अधिकारों के लिए लड़ रहे थे, केवल हिंदी के  अधिकारों के ही लिए नहीं, केवल हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए नहीं ।
स्वाधीनता से पूर्व ही हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में सशक्त एवं सक्षम बनाने के लिए महावीरप्रसाद द्विवेदी ने अथक प्रयास किए । हिंदी के सशक्तिकरण के लिए उन्होंने ‘सरस्वती ‘ पत्रिका को माध्यम बनाया । राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचारक महावीरप्रसाद द्विवेदी अन्य भारतीय भाषाओं से देशवासियों को प्रेम करना सिखाते हैं ।
भारतीय नवजागरण अथवा पुनर्जागरण आंदोलन के लक्ष्य व्यापक सामाजिक सुधार के थे । तत्कालीन भारतीय जीवन में व्याप्त कुरीतियों, रूढ़ियों, अंधविश्वासों, धार्मिक कट्टरता और जातिगत भेदभाव की विषमताओं को मिटाकर एक नए आधुनिक भारतीय समाज के पुन: प्रतिष्ठापन का संकल्प ही नवजागरण के पुरोधा आंदोलनकारियों एवं चिंतकों का उद्देश्य था । भारत के प्राचीन सांस्कृतिक वैभव की पुन: प्रतिष्ठा एक महती कल्पना थी । अंग्रेजों के शासन काल में भारत में व्याप्त उपनिवेशवादी सभ्यता और संस्कृति से उत्पन्न भाषिक संकट से उबरने का लक्ष्य भी नवजागरण आंदोलन में समाहित था । स्वतंत्र भारत की कल्पना का मूल आधार ही भारतीयता और स्वाधीन राष्ट्रीय अस्मिता रही है । स्वतन्त्रता संग्राम का माध्यम व्यापक रूप से हिंदी एवं इतर भारतीय भाषाएँ ही रहीं है । इसीलिए भाषाई अस्मिता के संदर्भ में हिंदी ही भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का पर्याय है ।      


संदर्भ :
1          महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण पृ : 191 ( ले॰ रामविलास शर्मा )
2          वही पृ : 191 
3          वही पृ : 192
4          वही पृ : 192
5          वही पृ : 193


                                                            डॉ एम वेंकटेश्वर
                                                            हैदराबाद ।
                                                            संपर्क : 9849048156
                                                            Email : mannar.venkateshwar9@gmail.com



                    

हिंदी : वर्तमान संदर्भ में

                                    हिंदी : वर्तमान संदर्भ में                                                                                                                                                         डॉ एम वेंकटेश्वर

हिंदी का वर्तमान और भविष्य आज आम देशवासियों में चर्चा का विषय नहीं रह गया, यह एक निर्विवाद सत्य है,  विशेषकर हिंदी एवं इतर भारतीय भाषाओं के प्रयोग एवं विकास के प्रति आम जनता गंभीर नहीं है । उसके पास भाषाई मुद्दों पर विचार करने का समय और संवेदना दोनों नहीं हैं । अधिकांश भारतीय, विशेषकर सुशिक्षित बुद्धिजीवी वर्ग भारत की भाषिक समस्याओं पर विचार करने के लिए तैयार नहीं है । शिक्षित युवा पीढ़ी को  हिंदी की स्थिति पर चर्चा करना समय और शक्ति की बरबादी प्रतीत होती है ।  प्रौद्योगिकी-ग्रस्त उन्मादी युवा पीढ़ी और कारपोरेट क्षेत्र के तथाकथित मुख्य कार्यकारी आधिकारीगण कुछ अंग्रेजी के प्रयोग में सक्षम भारतीयों  को ही देश का चेहरा और विकास का पर्याय मानते हैं । इसी धारणा का प्रचार-प्रसार देश में तेजी से किया जा रहा है । आज की युवा पीढ़ी जिन्हें अंग्रेजी माध्यम में ही शिक्षा उपलब्ध है, जो पश्चिमी तौर तरीकों में ही पलते हैं और पाश्चात्य शैली के रहन-सहन, खान-पान, वेषभूषा को सहर्ष गले लगाते हैं, जिनकी सामान्य बोलचाल की भाषा फूहड़ अंग्रेजी है, वे हिंदी एवं इतर भारतीय भाषाओं के साथ अपनी मातृभाषा की हंसी उड़ाते हुए हर सार्वजनिक स्थल पर, चमक-दमक से भरे ‘मॉल ‘ के स्टारबक्स, कॉफी डे, मैक्डोनल्ड, के एफ सी, सब वे, बारिस्टा जैसे महंगे पश्चिमी रेस्त्रों में घंटों बतियाते और शोर मचाते हुए अपनी वाक्-स्वतन्त्रता के अधिकार का सदुपयोग करते हुए नजर आएंगे । हिंदी की वर्तमान स्थिति को आँकने के लिए ऐसे सार्वजनिक स्थलों में आम भारतीय के संवाद की भाषा का सर्वेक्षण किया जा सकता है । यात्रा के दौरान रेलगाड़ी और बसों में भी थोड़ी बहुत हिंदी और स्थानीय बोलियाँ सुनाई दे जाती हैं, किन्तु यहाँ भी सुशिक्षित युवा पीढ़ी अंग्रेजी में कुछ हिंदी एवं स्थानीय बोलियों के शब्दों की मिलावाट युक्त सम्प्रेषण का माध्यम चुन लेती है । हवाई अड्डों और विमान यात्राओं में तो अंग्रेजी से कमतर कोई दूसरी भारतीय भाषा लगभग नहीं सुनाई देती । हमारे देश में बिना अंग्रेजी बोले विमान यात्रा निषिद्ध मानी जाती है, । विमान परिचारिकाओं को अपनी ओर आकर्षित करने या उनकी
ओर आकर्षित होने का एक मात्र संवाद का माध्यम अंग्रेजी (हिंगलिश ) ही है । उपर्युक्त परिदृश्य आज भारत की भाषिक वास्तविकता है । भारतवासी सामान्य बोलचाल, कामकाज, शिक्षा, कारोबार, प्रबंधन, व्यापार एवं वाणिज्य आदि सभी क्षेत्रों में आधिकारिक रूप से अंग्रेजी के प्रयोग को देश की उन्नति और विकास का मानदंड स्वीकार कर चुके हैं । अंग्रेजी को ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय धरातल पर भारत का चेहरा बना दिया गया है । हिंदी और भारतीय भाषाओं का राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर समर्थन करने वाले लोगों की संख्या नगण्य है और उनकी वह आवाज कोई नहीं सुनता और न ही उन्हें गंभीरता से लिया जाता है । राजनीतिक परिदृश्य में यह वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बन गई है ।  हिंदी और भारतीय भाषाओं का प्रयोग और उनकी अस्मिता को कट्टरपंथी, रूढ़िवादी, परंपरावादी, मध्ययुगीन सोच  से जोड़कर हंसी उड़ाई जाती है या फिर किसी विशेष राजनीतिक खेमे से जोड़कर उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है । देश की शिक्षानीति भी हिंदी एवं इतर भारतीय भाषाओं की पक्षधर नहीं है । यदि अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा नीति को असंगत माना जाए तो उसे बदलने की दिशा में आज तक कोई प्रयास नहीं किए गए और न ही भविष्य में ऐसी कोई आशा ही दिखाई दे रही है जिससे हिंदी को वास्तव में राष्ट्रभाषा का संवैधानिक रूप से प्राप्त हो सके ।  हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मनसा, वाचा, कर्मणा  स्वीकार करने में देशवासियों की आपत्तियों एवं शंकाओं पर विचार करना आवश्यक है । देश में हिंदी समर्थक समुदाय, अल्पसंख्यक हो गया है ।
हिंदी और इतर  भारतीय भाषाओं की दुर्गति का एक महत्वपूर्ण कारण, देश की शिक्षा नीति और शिक्षा का माध्यम है । शिक्षा के माध्यम का भारतीयकरण आवश्यक है जो कि भारतीय राजनीतिज्ञों एवं नीतिकारों के लिए चुनौती है । राष्ट्रीय एकता के प्रधान तत्वों में राष्ट्र के लिए सर्व-स्वीकृत एक राष्ट्रभाषा का अस्तित्व अनिवार्य है । भारतीय भाषाओं में से किसी एक भाषा को हमें देश का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा के रूप में स्वीकार करना होगा । उसी भाषा में शिक्षा और कामकाज आदि सभी प्रकार्यों को संपन्न करना होगा । तभी हम हिंदी को भारत का मौलिक स्वरूप प्रदान करने में समर्थ होंगे । हिंदी के समर्थन का अर्थ, प्रांतीय भाषाओं की उपेक्षा अथवा उनके प्रति द्वेष का नहीं होगा बल्कि वह एक सेतु – भाषा का रूप धारण करेगी।  मातृभाषाओं को हिंदी के साथ जोड़ते हुए एक सर्वस्वीकृत शिक्षा नीति का विकास करने की आवश्यकता है ।  
वैश्वीकृत बाजारवाद, व्यापार एवं वाणिज्य में विदेशी निवेश आदि क्षेत्रों में हिंदी के प्रयोग पर बल देना आवश्यक है । तभी हम अपने लक्ष्य को साध सकते हैं । उदारीकृत बाजारवाद के नाम पर बाजार में हिंदी के बढ़ते प्रयोग को देखकर हिंदी के चहुंमुखी विकास का भ्रम पाल रहे हैं । आज यदि बाजार में हिंदी के   प्रयोग में वृद्धि हुई है तो वह केवल व्यापारिक लाभ के उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही हुई है ।  
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी भाषा प्रयोग की अपार संभावनाएँ हैं  किन्तु युवापीढ़ी अंग्रेजी को ही संपर्क भाषा मान बैठी है इसीलिए वे इसी के समर्थन में हिंदी का विरोध करते हैं । उन्हें ‘राष्ट्रभाषा’ की संकल्पना से कोई सरोकार नहीं है । युवा पीढ़ी अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा मान बैठी हैं और इसे राष्ट्रभाषा घोषित करने के लिए यह पीढ़ी संगठित होने लगी है । यदि हिंदी के समर्थन में कोई बात की जाए तो उनका तर्क है कि इस  हिंदी उनकी इच्छा के विरुद्ध उन पर लादी जा रही है । यह आश्चर्य का विषय है कि आज़ादी के इन 67 वर्षों में किसी भारतीय ने आज तक यह नहीं कहा कि भारतवासियों पर अंग्रेजी क्यों लाद दी गई ?
आज तक हिंदी रोजगार की भाषा नहीं बन सकी, जब कि अंग्रेजी रोजगार की भाषा बना दी गई है । इसीलिए युवा पीढ़ी को हिंदी से कोई लगाव नहीं । प्रत्येक युवा आजीविका के लिए समर्थवान भाषा माध्यम का चयन करता है, यह उसका मौलिक अधिकार है । इस उद्देश्य के लिए वह  देश में उपलब्ध शिक्षा माध्यम को स्वीकार करने के लिए बाध्य है ।  सरकारों की ढुलमुल, अस्पष्ट एवं तुष्टिकरण की भाषा नीतियों ने शिक्षा के माध्यम का अंग्रेजीकरण कर देश में परोक्ष रूप से अंग्रेजी राज को कायम रखा है ।  हमारी ही
अदूरदर्शी नीतियों का दुष्परिणाम ही हिंदी की दुर्दशा है । हिंदी की मौजूदा विचारणीय स्थिति के लिए आज का अंग्रेजी समर्थित और पोषित भारतीय मीडिया भी दोषी है । टीवी के निजी चैनल, रेडियो के एफ एम चैनल और प्रिंट मीडिया हिंदी के नाम पर जिस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं वह हिंदी भाषा को पूरी तरह ध्वस्त कर उसके अस्तित्व को समाप्त करने की मुहिम में सुसंगठित हो गए हैं । केवल सहायक क्रियाओं को लेकर पूरा का पूरा अंग्रेजी वाक्य देवनागरी में लिपि में छापा जाता है और मौखिक व्याख्याएँ एवं समाचार आदि भी उसी तरह की मिलावट वाली हिंदी में सुनाए जाते हैं । उदाहरण –  “ट्रेफिक जाम में इन्वोल्व होकर डिले हो गया ।“ पी एम यू एस के ट्रिप और गए । “ “बजट सेशन फ्लॉप हो गया । “ बॉक्स ऑफिस पर फिल्म हिट हुई । “ फ़ोरेन बैंक से ब्लैक मनी लाने में गवर्नमेंट फेल । “ यह है आज की हिंदी पत्रकारिता का नमूना है ।  विज्ञापन के बाजार ने हिंदी की हत्या करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । रोमन लिपि में विज्ञापनों का बाजार गरम है । सौन्दर्य प्रसाधन पत्रिकाएँ, केवल रोमन लिपि में लिखित अंग्रेजी से ही अपनी कृत्रिम चमक व्याप्त कर रही हैं । समय के साथ हिंदी के प्रति उदासीनता और उपेक्षा भी बढ़ी है ।  सतही तौर पर भाषिक प्रयोजन के लिए कुछ योजनाएँ लागू करने के संकेत मिलते हैं किन्तु हिंदी के संरक्षण एवं उन्नयन हेतु कोई ठोस निर्णय लेने की स्थिति में प्रशासन तंत्र नहीं है । चेतन भगत जैसे अंग्रेजी कथाकार जब रोमन लिपि में हिंदी भाषा के प्रयोग की अवधारणा को विज्ञापित करने का प्रयास करते हैं तो इसके विरोध में हिंदी समर्थकों का आक्रोश जिस तरह व्यक्त हुआ वह उचित ही है ।  
हिंदी भाषा की दशा और दिशा पर विचार करना केवल हिंदी भाषा-साहित्य से जुड़े  शिक्षकों, हिंदी विभागों, अनुभागों प्रकोष्ठों, और हिंदी प्रेमियों का ही कर्तव्य बनकर रह गया है । स्वाधीनता प्राप्ति के 67 वर्षों के बाद भी आज तक हिंदी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर निर्विवाद रूप से समस्त भारतवासियों ने हृदय से स्वीकार नहीं किया है जो कि एक परम सत्य है । सितंबर का महीना हिंदी भाषा के महिमामंडन का होता
है । 14 सितंबर को  1949 को संविधान में हिंदी को राजभाषा घोषित किए जाने के उपलक्ष्य में सरकारी तौर पर हिंदी ( राजभाषा ) दिवस को समारोह-पूर्वक मनाने की परंपरा चली आ रही है । हिंदी दिवस समारोह केवल एक प्रशासकीय पर्व के रूप में शेष रह गया है, जिसे महज औपचारिकता की दृष्टि से देखा जाता है ।  यह भी गौरतलब है  कि हिंदी को भावनात्मक स्तर पर देश के अधिकांश लोग राष्ट्रभाषा मानते हैं, हालाकि संविधान में कहीं भी आधिकारिक तौर पर इसका उल्लेख नहीं मिलता ।  हिंदी ही राष्ट्रभाषा क्यों अंग्रेजी क्यों नहीं हो सकती ? यह प्रश्न ज्वलंत रूप में बहस का विषय बना हुआ है ।  देश में अंग्रेजी की लहर ज़ोरों पर चल रही है । चाहे इस तथ्य को कोई माने या न माने, किन्तु शिक्षित और अशिक्षित  दोनों वर्गों में अंग्रेजी के प्रति बढ़ता मोह और सम्मोहन, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की अस्मिता को चुनौती दे रहा है । यह भी एक स्वीकृत सच है ।
हिंदी बनाम अंग्रेजी की समस्या दिन पर दिन जटिल होती जा रही है । इसका कारण, अंग्रेजी का बढ़ता वर्चस्व और प्रभाव है । भाषाओं के प्रति उपयोगितावादी दृष्टिकोण ही वर्तमान स्थितियों में व्यावहारिक      
लगती है । हिंदी का वर्तमान स्वरूप बहुआयामी है । किसी भी भाषा का उपयोग महज साहित्य सृजन के लिए ही नहीं होता बल्कि भाषा का मूल प्रयोजन संप्रेषण के माध्यम से दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होता है । भाषा का प्रयोग दैनंदिन जीवन में नाना रूपों में किया जाता है । साहित्य के लिए भाषा का उपयोग न्यूनतम होता है । भाषा का यह प्रयोजनमूलक स्वरूप किसी भी भाषा को प्रयोगजन्य और
व्यावहारिक बनाता है ।
संविधान की आठवीं अनुसूची में बाईस भाषाओं को शामिल किया गया है जिसमें हिंदी भी एक है ।
संविधान के अनुसार ' हिंदी ' को राजभाषा का दर्जा तो हासिल हुआ है लेकिन  ' राष्ट्रभाषा ' के रूप में इसका उल्लेख संविधान में नहीं हुआ है । इस तरह संविधान में हिंदी की स्थिति नाजुक और कमजोर है ।
इसके कारण जो भी हों, किन्तु आज यही असंगति बहुत बड़ी समस्या बन गई है । अंग्रेजी के बरक्स आज देश के कुछ हिस्सों में हिंदी के प्रति अलगाववादी नजरिया सामने आ रहा है जो कि  राष्ट्रीय एकता के लिए घातक है । हिंदी की छोटी सी पहल भी अंग्रेजी के पक्षधर लोगों को नागवार लगती है जिससे ऐसे समुदाय  हिंदी के विरोध में लामबंद हो जाते हैं ।  इस स्थिति में सरकार बेबस और बेअसर नजर आती है । हिंदी को भारत एक बहुभाषी और संस्कृति-बहुल देश है जिसका इतिहास अतिप्राचीन है । शताब्दियों से यहाँ विश्व के हर कोने से विभिन्न भाषिक संस्कृतियाँ अपनी सामाजिकता के साथ आकर स्थिर हो गईं । भाषा और संस्कृतियों की बहुवचनीयता ने इस देश में एक नई सामासिक संस्कृति को जन्म दिया जो भारत की पहचान बन गई । हिंदी इस सामासिक संस्कृति की वाहिका है, इस सत्य को प्रत्येक भारतवासी को आत्मसात करना होगा । हिंदी समस्त भारतीय भाषाओं का समाहार है जिसमें भारत की सारी भाषाएँ और बोलियाँ समाई हुई हैं । संविधान का 351 अनुच्छेद इसी भाव को सुनिर्दिष्ट करता है ।
हिंदी को राजभाषा के रूप में संविधान के अनुच्छेद 343 में स्पष्ट कर दिया गया है  । इसके कार्यान्वयन के लिए भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर केंद्र सरकार के कार्यालय, उपक्रम तथा बैंकों में इसके प्रयोग को अनिवार्य कर दिया है । इसके कार्यान्वयन के लिए अनेक  निकायों का गठन किया गया है जो कि निर्विराम हिंदी को सरकारी कामकाज में पूर्णत: प्रयोग में लाने के लिए सरकारी संगठनों,उपक्रमों और बैंकों को दिशा निर्देश देती है । राजभाषा  के कार्यान्वयन के क्षेत्र में सरकार को कुछ हद तक सफलता प्राप्त हुई है । राजभाषा कार्यान्वयन के अंतर्गत केंद्र सरकार के कार्यालयों, उपक्रमों और बैंकों में हिंदी भाषा के शिक्षण, प्रचार और प्रसार का कार्य, संबंधित संस्थाओं के राजभाषा विभागों को सौंपा गया है । हिंदी के प्रगामी प्रयोग को कारगर बनाने के लिए राजभाषा विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाता है । राजभाषा के कार्यान्वयन के निर्धारित मानदंडों के अनुसार कार्यालयी कामकाज में हिंदी का प्रयोग करना अनिवार्य है। इस दिशा में राजभाषा विभागों द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले आंकड़े हिंदी की संतोषजनक प्रगति की ओर  संकेत करते हैं । किन्तु खेदजनक स्थिति यह है कि आज भी हिंदी में काम करने के लिए सरकार को प्रोत्साहन योजनाओं का सहारा लेना पड़ रहा है । कर्मचारी ऐच्छिक रूप से इसे स्वीकार करने में उत्साह नहीं दिखा रहे हैं ।  सरकारी क्षेत्रों में हिंदी भाषा का स्वरूप भिन्न भिन्न संगठनों में वहाँ के प्रकार्य के अनुरूप होता है । इस प्रकार्यात्मक विविधता के कारण हर कार्यक्षेत्र के लिए भिन्न पारिभाषिक शब्दावली और तकनीकी शब्दावली की आवश्यकता होती है । पारिभाषिक शब्दावली निर्माण के लिए केंद्र सरकार ने ' वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग ' का गठन किया है जो विभिन्न कार्य क्षेत्रों के लिए आवश्यक पारिभाषिक शब्दावली मुहैया कराती है ।
हिंदी में कामकाज करने में सबसे बड़ा बाधक तत्व शिक्षा का माध्यम है । भारतीय शिक्षा प्रणाली अंग्रेजी प्रधान है । यह गौरतलब है कि स्कूली शिक्षा भले ही मातृभाषा ( भारतीय भाषा ) माध्यम में उपलब्ध हो जाए किन्तु उच्चशिक्षा  और व्यावसायिक शिक्षा का माध्यम भारत में अंग्रेजी ही है । देश की अंतराष्ट्रीय छवि के लिए तथा विश्व बाजार से जुडने के लिए हमारी सरकारों ने भारतीय भाषाओं की उपेक्षा करके हमारी अपनी भाषाओं के एवज में अंग्रेजी को तरजीह दी और शनै: शनै:  क्षेत्रीय भाषाओं  (मातृभाषा) को विस्थापित कर अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बना दिया । जाहिर है कि जो शिक्षा का माध्यम होगा वही कामकाज का माध्यम होगा, ऐसे में इतर भाषा में कामकाज करना कैसे संभव है ? यह अंतर्विरोध हमारे देश में आज़ादी के समय से ही चला आ रहा है जिसका निदान सरकार आज तक नहीं ढूंढ पाई है ।  
अंग्रेजी राज खत्म हो गया, देश में हमने अपनी सरकारें तो बनाईं  किन्तु हम उस गुलामी की मानसकिता और तौर-तरीकों से निजाद नहीं पा सके । अंग्रेजी शिक्षाविदों ने देश में एक भ्रम फैला दिया कि अंग्रेजी ही सभ्यता की भाषा है, अंग्रेजी ही देशवासियों को सुसभ्य बना सकती है, आधुनिक बना सकती है, ज्ञान-विज्ञान का साहित्य केवल अंग्रेजी में ही उपलब्ध है इसलिए हमें अंग्रेजी में अपने शिक्षातंत्र को विकसित  करना चाहिए । 
नब्बे के दशक में उठी वैश्वीकरण रूपी सुनामी की उत्ताल तरंगों ने राष्ट्रीय संस्कृति और सोच को ही निगल  लिया । बाजारवादी और उपभोक्तावादी नीतियों ने देश की भाषिक अस्मिता को गंभीर रूप से चोट पहुंचाई है  । स्वातंत्र्योत्तर शासन तंत्र में देश की भाषाई समस्या के प्रति उदासीनता ही दर्शाई है । वोट बैंक की राजनीति ने हर राजनीतिक दल को राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति असंवेदनशील ही बनाए रखा । हिंदी को देश की एकमात्र प्रयोजनमूलक भाषा के साँचे में ढालकर उसे भारत की पहचान बनाने में सभी राजनीतिक दल और उनकी सरकारें विफल रहीं । आज तक हिंदी और भारतीय भाषाओं को शिक्षा और कामकाज के योग्य रूपायित नहीं किया जा सका है ।यह देश की आम जनता के लिए भी चिंतन तथा आत्मावलोकन के लिए महत्त्वपूर्ण विषय है ।        
भारत राष्ट्रभाषा की समस्या से जूझ रहा है । दिन पर दिन इसे अधिक जटिल बनाया जा रहा है । राजनीतिज्ञों और सरकारों में राष्ट्रभाषा की समस्या को सुलझाने की दृढ़ इच्छा शक्ति का पूर्णत: अभाव दिखाई देता है । सरकारें इस समस्या से बचना चाहती हैं । हिंदेतर प्रदेशों और समूहों में हिंदी के प्रति राजनीतिक विरोध का वातावरण जो बना हुआ है उसे दूर करने की कोशिश हर भारतीय को करना चाहिए । हिंदी और हिंदेतर समुदायों के मध्य विभेद को मिटाने के लिए हिंदी सीखने और सिखाने के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता है । हिंदी के लिए ' थोपने ' जैसे शब्दों के प्रयोग को स्वीकार नहीं करना चाहिए । जब कि वास्तव में अंग्रेजी बलपूर्वक योजनाबद्ध तरीके से जनसामान्य पर थोपी गई है, जिसके संबंध में विचार करने के लिए कोई तैयार नहीं है, यह नितांत दुर्भाग्यपूर्ण है । संघीय लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में अंग्रेजी के वर्चस्व पर जब जब सवाल उठता है, आयोग अपनी स्वायत्तता की धौंस जमाकर उसे कुचलकर रख देता है । संसद बेबस और लाचार है, वहाँ वाद-प्रतिवाद के अलावा कोई समुचित समाधान नहीं मिल पाता है ।  सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष इसे वोट बैंक की राजनीति में परिवर्तित कर अपना पल्ला झाड लेते
हैं ।  युवा पीढ़ी शिक्षा तंत्र में सरकार की भाषाई नीतियों से पीड़ित है । मीडिया चैनलों का अंग्रेजी के पक्ष में  हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध में जनमत तैयार करने के प्रयास निंदनीय हैं । एक टीवी चैनल चीख चीख कर हल्ला मचा रहा है कि 'प्रशासनिक सेवा ' के प्रत्याशियों के लिए अंग्रेजी में प्रवीणता अनिवार्य है, इसके बिना वह भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी बनने और कहलाने योग्य नहीं हो सकता ।
हिंदी के राजभाषा स्वरूप से भिन्न सामान्य हिंदी की स्थिति आश्चर्यजनक रीति से दिन दूनी रात चौगुनी बेहतर होती जा रही है ।  बोलचाल की सामान्य हिंदी आज स्थानीय रंग में रंगकर हर प्रदेश में अपनी विशेष पहचान बना रही है । शहरी संभ्रांत बैठक-खानों तक ही सीमित अंग्रेजी को पछाड़कर हिंदी का व्यावहारिक स्वरूप बहुत तेजी से हिंदी और हिंदेतर क्षेत्रों में फैल रहा है । हिंदी सिनेमा ने सामान्य हिंदी जिसे सिनामाई हिंदी भी कहा जा सकता है, के प्रचार में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है । हिंदी सिनेमा में भाषिक स्तर पर नित नए आंचलिक प्रयोग सफलतापूर्वक हो रहे हैं । हिंदी सिनेमा ने भाषिक स्टार पर हिंदी-उर्दू मिश्रित हिंदुस्तानी, ठेठ हिंदी और उर्दू भाषा शैलियों को जनसामान्य में लोकप्रिय बनाया ।  सिनेमा के माध्यम से विदेशों में भी हिंदी अपनी पहचान बना चुकी है ।  देश के भीतर स्थानीय हिंदी  लोकप्रिय हो रही है । देशवासी उसे पसंद कर रहे हैं । बनारसी हिंदी, मद्रासी हिंदी, हरयाणवी हिंदी, पंजाबी हिन्दी, मराठी मिश्रित हिंदी, बंबइया हिंदी, बंगाली-हिंदी आदि को सहजता से पहचाना जा सकता है । आज हिंदी का अखिल भारतीय स्वरूप स्थानीयता के साथ जुड़ गया है ।
आज हिंदी के प्रति जहां कहीं भी विरोध प्रकट हो रहा है, वह राजनीतिक उद्देश्यों से संप्रेरित है जिसका समाधान राजनीतिज्ञों को ही करना है । भारतीयता को यदि हम अपनी अस्मिता मानते हैं तो हमें अपनी भाषाओं को ( मुख्य रूप से हिंदी को ) राष्ट्रीय भाषा के रूप में शिक्षा, कामकाज और बोलचाल में मूल रूप से स्थापित करना होगा । इसके लिए आवश्यक प्रयास करने होंगे, इसके लिए भाषिक नवजागरण आंदोलन आवश्यकता  है । हर हाल में देश में हिंदी की स्वीकार्यता को अनिवार्य करना होगा ।

                                                                                    डॉ एम वेंकटेश्वर   
                                                                                    पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष
                                                                                    हिंदी एवं भारत अध्ययन विभाग
                                                                                    अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय
                                                                                    हैदराबाद । मो – 9849048156
                                                              Email : mannar.venkateshwar9@gmail.com
                                                                                                                                                                       
                                                                                                                         



Saturday, June 25, 2016

ब्रिटेन का यूरोपियय यूनियन समूह से प्रस्थान - यूरोपीय इतिहास में एक नया अध्याय ।

ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से प्रस्थान यूरोपीय इतिहास मे एक नया मोड है और यह घटना एक नए अध्याय को प्रारम्भ कर रही है । यह घटना इंग्लैंड वासियों की दृश इच्छा शक्ति, आत्मनिर्णय की क्षमता और राष्ट्रभक्ति  का परिचायक है । भले ही इंग्लैंड के बहुसंख्यक जनता के इस जनमत से इंग्लैंड का ही वर्ग संतुष्ट न हो किन्तु इस  निर्णय ने समूचे विश्व को अवश्य चौंका दिया । विशेषकर अमेरिका और यूरोप के शक्तिशाली देश, जर्मनी, फ्रांस और आस्ट्रिया बेल्जियम जैसे देशों को बहुत बड़ा धक्का लगा है । इन महाशक्तियों ने इंग्लैंड से यह उम्मीद नहीं ई थी की वह संघ का साथ छोड़ देगा । इस घटना के पर्यवसान काफी दूरगामी हैं और इस इंग्लैंड के इस जनमत से आर्थिक क्षेत्र मे ही सबसे ज्यादा प्रतिकूल परिणामों की कल्पना की जा रही है । हालाकि ब्रिटेन एक शक्तिशाली आत्मनिर्भर राष्ट्र है ज्सिका अपना एक सुनहरा इतिहा है। इस देश ने विश्व के बहुत बड़े भूभाग पर सदियों राज्य किया । पूर्व और पश्चिम के गरीब और समृद्ध देशों से सांस्कृतिक और आर्थिक आदान प्रदान किया । पूर्वी यूरोपीय निर्धन देशों को यूरोपीय संघ शामिल  करने के लिए ब्रिटेन ने बहुत अहम भूमिका निभाई है । पूर्वी यूरोप के देश जैसे हंगरी, बुल्गारिया, पोलैंड, रूमानिया आदि देश आर्थिक रूप से बहुत ही पिछड़े रहे हैं । ये देश 1989  से पहले रूसी राजनीतिक सिद्धांतों के अनुयायी रहे हैं जिससे उनको अपनी स्वायत्ततापूर्ण सार्वभौम लहचान नहीं मिली थी । रूस के साये मे ये देश घुटन पहसूस कर रहे थे । रूसी आर्थिक संबल इनके लिए अनिवार्य था । किन्तु 1989 मे रूस के विकेन्द्रीकरण के बाद लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली को अपनाने के समय से इन्हें काफी आर्थिक सनकाट का सामना करना पड़ा । उस संकट के समय यूरोपीय संघ संगठित हुआ किन्तु ऐसे पिछड़े और आर्थिक रूप से दुर्बल राष्ट्रों के लिए यूरोपीय संघ मे जगह नहीं थी । क्योंकि इस संघ के सदस्य राष्ट्रों की आर्थिक स्थितियों को न्यूनतम सुरक्षा प्रदान करना संघ का कर्तव्य भी था । इंग्लैंड के हस्तक्षेप और पहल से ही ये सारे आर्थिक रूप से कमजोर देश भी यूरोपीय संघ मे सदस्यता हासिल कर सके जिसका परिणाम उनके लिए बहुत ही लाभकारी रहा । इन देशो की आर्थिक स्थिति मे बहत जल्दी बदलाव आया । धीरे धीरे इन देशों मे नई चमक और नया आत्मविश्वास जागा जिससे इन देशों की आर्थिक स्थिति काफी हद तक सुधार गई । ब्रिटेन के इस तरह यूरोपीय संघ से नाता तोड़ लेने से इन कमजोर देशों पर से मानो एक अभिभावक का साया ही सर से उठ गया ।
ब्रिटेन के नागरिकों ने अपने देशवासियों के सुखी और संतोषपूर्ण जीवन को सुस्थिर करने के लिए, अपने स्वाभिमान की रक्षा हेतु यह निर्णय लिया है । इस निर्णय से इंग्लैंड के नागरिक अपनी अर्थव्यवस्था का संचालन स्वयं बिना बाहरी हस्तक्षेप के कर सकेंगे । यूरोपीय देशों मे बढ़ते शरणार्थियों की समस्या से निपटने के लिए ब्रिटेन का यह कदम कारगर होगा । वे अपनी सीमाएं शरणार्थियों के लिए खोलने के लिए संघ के निर्णय के अनुसार बाध्य नहीं होंगे । नौकरियों मे भी अब विदेशियों  को वह अधिकार नहीं मिलेगा जो संघ के अधीन रहते हुए मिलता रहा है ।
ब्रिटेन के इस निर्णय का असर भारत और ब्रिटेन के संबंधों पर व्यापार और वाणिज्या के क्षेत्र मे पद सकता है । आयात-निर्यात की नीतियों में भारी फेर बादल हो सकता है और भारत को अब तक उपलब्ध लाभ से वंचित होना पड़ सकता है । एक ओर इंग्लैंड जैसा शक्तिशाली देश अपनी सीमाएं बाहरी हस्तक्षेप के लिए बंद कर रहा है और हम हमारे देश मे शतप्रतिशत विदेशी निवेश को आमंत्रित कर अपनी ही अर्थ व्यवस्था पीआर कुल्हाड़ी मार रहे हैं । व्यापार एवं वाणिज्य के क्षेत्र मे विएशी निवेश को बढ़ावा देकर ' मेक इन इंडिया ' के सपने को कैसे हम साकार करेंगे, यह बात समझ मे नहीं आती ।
जो भी हो इंग्लैंड के यूरोपीय संघ से प्रस्थान की यह ऐतिहासिक घटना यूरोप के भविष्य को किस दिशा मे ले जाएगी इसे देखने के लिए प्रतीक्षा करनी होगा । 

Saturday, December 5, 2015

प्राकृतिक आपदा या मानव की अतिमहत्वाकांक्षा का परिणाम, एक महानगर की तबाही -

आज सारा विश्व पर्यावरण संबंधी आपदाओं से जूझ रहा है । ओज़ोन पर्त की क्षीणता, ग्रीन हाऊस गैस का निर्धारित मात्रा से अधिक रिसाव, भारी उद्योगों से विसर्जित कार्बन डायाक्साईड, वायुमंडल मे व्याप्त जहरीली गैस, वायु प्रदूषण, मोटर वाहनों से निकला हुआ धुआँ, शहरों में जलभराव की स्थितियाँ, रासायनिक उद्योगों से निसृत अवशेष और रद्दी, शहरों मे निकास सुविधाओं की कमी आदि से उत्पन्न ऐसी आपदाएँ हैं जो की मानव सभ्यता पर भारी पड़ रही हैं । ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए जिन ईंधनों का इस्तेमाल होता है, उससे भी अनेक प्रकार की जहरीली हवाएँ और गैस वायुमंडल को प्रदूषित करते हैं । शहरों मे जिस तीव्र गति से  हरियाली को काट काटकर कांक्रीट के जंगल बनाए जा रहे हैं, इससे मानव सभ्यता इन कांक्रीट के जंगलों मे ही कैद हो कर रह गई है । मनुष्य को सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा नसीब नहीं हो रही है । इस कारण बीमारियाँ बढ़ रहीं हैं । फेफड़े और दिल की बीमारियाँ, कैंसर जैसे घातक रोग बढ़ते जा रहे हैं ।
इधर चेन्नई शहर में पिछले सप्ताह जो भयानक बारिश हुई, उससे जो तबाही हुई, उसकी कल्पना से ही रूह काँप उठती है । समुद्र से उठा चक्रवाती तूफान जब तट को पार करता है तो भीषण वर्षा होती है, यह प्रकृति सहज है । लेकिन केवल चार दिनों मे ही कई सौ सेंटीमीटर की भीषण वर्षा जो कि  अनुमान से परे है, इतनी वर्षा की सारा शहर ही डूब जाए और एक द्वीप मे परिवर्तित हो जाए और वह भी अकस्मात, हो जाए तो कोई भी सरकारी तंत्र ऐसी आपदा से शहरवासियों की कैसे मदद कर सकेगा । इस वर्षा ने समूचे चेन्नई शहर को निगल लिया । दो दो मंजिल की ऊंचाई तक शहर मे पानी भर गया । बिजली बंद हो गई, संचार के साधन नष्ट हो गए, रेल और सड़क यातायात थम गया, सड़कें और रेल लाईनें बह गईं।पुल  बह गए । हवाई अड्डा पानी से भर गया, रन वे पानी मे अदृश्य हो गए, संचार व्यवस्था भारी बारिश से नष्ट हो गई । भोजन, पानी और दवाएं पानी में बह गए । कुछ नहीं बचा । लोगो भोजन और पानी के लिए तरस रहे हैं । अस्पतालों मे बिजली के कट जाने से मरीजों की मौत हो गई । ऑक्सीज़न आपूर्ति के रुक जाने से आईसीयू के मरीज नहीं बच सके । हॉस्टल में मूक और बधिर बच्चे अन्न और पानी के अभाव में मरणासन्न  अवस्था मे जा पहुंचे जब उन्हें स्थानीय लोगों ने मदद की जिससे उनके प्राण बच गए ।
वर्षा के थमने के बाद बचाव और राहत कार्य मे तेजी आई है किन्तु बचाव और राहत कार्य मे समन्वय के न होने के कारण बाहर से सेना और अन्य सुरक्षा बलों के सक्रिय होने पर भी बहुत सारे इलाके राहत और सहायता के लिए इंतजार कर रहे हैं । सेना, पुलिस और अन्य आपदा सहायक संगठनों के सेवाकर्मियों ने बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है और वे कर रहे हैं ।  नगरवासी भी अपने अपने इलाकोने में स्वैच्छिक रूप से एक दूसरे की मदद कर रहे हैं । यह एक बहुत अच्छी मिसाल है । छात्र संगठन और युवा कार्यकर्ता नावों में घूम घूमकर पानी मे फंसे हुए लोगों को सुरक्शित स्थानों मे पहुंचाने का काम कर रहे हैं । चेन्नई महानगर ने एक बहुत ही शानदार मिसाल कायम की है । संकट पुर आपदा में शहरवासी हिम्मत नहीं हारे, सरकार को बेज्जत नहीं किया और जिनको जो बन पड़ा वह अपने साथी लोगों को बचाने के कार्य मे लग गया ।इस आपदा ने शहर में एक जुटता   ला दी ।
किन्तु भारी वर्षा से शहर मे इतनी तबाही का कारण केवल वर्षा ही नहीं है । बल्कि शहर की बनावट और उसका विस्तार है जो बेतरतीब से फ़ेल गया है । अनियंत्रित ढंग से बड़े बड़े निर्माण हुए हैं, पानी की निकासी को अवरुद्ध करके ऊंची ऊंची इमारतें बना दी गईं। झीलों और तालाबों का अतिक्रमण करके कालोनियाँ बसा दी गईं । नदी और नाले के बहाव को रोक कर वहाँ भी मकान और उपनगर बसा दिया गया । सरकार ने आर्थिक आमदनी के लालच मे अनियमित निर्माणों को भी पैसे ले लेकर नियमित कर दिया । पानी के बहाव के लिए कोई भी मार्ग नहीं छोड़ा गया, इसीलिए यह भारी विपत्ति शहरवासियों पर ऐसे आ गिरी जिसका समाधान किसी के पास नहीं है । अब समय आ गया है जब सरकारें और जनता भी इस विषय पर विचार करे और उन सारे अनिधिकृत निर्माणों को तोड़ गिराए जो पानी के बहाव के मार्ग मे बाधक बनाकर खड़ी हो गई हैं । तालाब और झीलों मे अनधिकृत रूप से बने हुए इमारतों को हटाना होगा तभी इस प्रकार का संकट भविष्य में नहीं पैदा होगा ।      यह स्थिति केवल एक शहर में नहीं है बल्कि आज भारत के सभी महानगरों का यही हाल है । इससे पहले यह स्थिति मुंबई महानगर में आई थी लेकिन हमने उससे कोई सबक नहीं सीखा । दिल्ली मे भी जब जब भारी बारिश होती है तो अधिकतर इलाकों मे जलभराव होता है और लोगों को बहुत तकलीफ झेलनी पड़ती है । अब समय आ गया है कि हम ऐसी स्थितियों से निबटने का कोई समाधान ढूंढें और उस पर अमल करें । 

Wednesday, November 18, 2015

प्रेम रतन धन पायो

राजश्री प्रोडक्शन का नवनिर्मित, सूरज बड़जात्या  द्वारा निर्देशित ' प्रेम रतन धन पायो ' राजश्री निर्माण संस्था की सुदीर्घ अंतराल के बाद ( नौ वर्षों के बाद )  आई हुई फिल्म है । सूरज बड़जात्या निर्देशित फिल्मों का सिनेप्रेमियों को इंतजार रहता है । राजश्री एक ब्रांड है, सांस्कृतिक मूल्यों और पारिवारिक संबंधों के प्रति दर्शकों मे नई ऊर्जा और विश्वास जगाने के लिए । 60 के दशक मे दक्षिण से प्रसाद, जेमिनी और ए वी एम स्टुडियो (निर्माण संस्थाओं ) पारिवारिक मूल्यों को संवर्धित करने वाली फिल्में बनाने के लिए मशहूर हुई थीं । राजश्री निर्माण संस्था का जन्म 1962 में 'आरती ' से हुआ जिसमें  मीना कुमारी- प्रदीप कुमार- अशोक कुमार की एक त्रिकोणात्मक प्रेम कथा के साथ साथ प्रेम और मैत्री के बीच द्वंद्व का चित्रण बहुत ही सुंदर और आकर्षक ढंग से हुआ है । उन दिनों मीना कुमारी- प्रदीप कुमार, अशोक कुमार - मीना कुमारी युगल जोड़ी बहुत लोकप्रिय थी ।   राजश्री प्रोडकशन की फिल्मों के लिए साठ और सत्तर के दशक में हिंदी फिल्म जगत के सुविख्यात निर्देशकों ने निर्देशन किया जिनमें नितिन बोस, बासु चटर्जी, लेख टंडन आदि प्रमुख हैं । उसके बाद ताराचंद बड़जात्या अपनी संस्था के लिए निर्देशन का भार संभाला और बहुत ही सफल, लोकप्रिय फिल्में बनाईं । दुल्हन वही जो पिया मन भाए, पिया का घर, उपहार, नदिया के पार, गीता गाता चल, चितचोर आदि फिल्में इनके निर्देशन मे निर्मित हुईं जो आज भी लोग याद करते हैं । राजश्री प्रोडक्शन  की फिल्मों के गीत और उनका संगीत माधुर्य और कर्णप्रियता के लिए सदाबहार होते हैं । उनके फिल्मों के गीत-संगीत की  लोकप्रियता आज तक बनी हुई है । यह एक परंपरा के रूप में हिंदी सिनेमा जगत मे समादृत होती है । सन् 2006 मे निर्मित 'विवाह ' के बाद अब
' प्रेम रतन धन पायो '  हिंदी के साथ तेलुगु  और तमिल भाषाओं मे भी डब होकर रिलीज़ हुई है ।इससे पहले की फिल्म  'विवाह ' भारतीय संस्कृति से सगाई और विवाह के बीच वर-वधू की संवेदनाओं को अत्यंत बारीकी और काव्यात्मक कलात्मकता से प्रस्तुत करती है । भारतीय समाज मे कुछ ऐसी परम्पराएँ जो लुप्त प्राय सी हो गई हैं, उन्हें राजश्री फिल्म निर्माता याद दिलाते हैं और उन्हें पुन: प्रतिष्ठापित करने के लिए कृत संकल्प हैं । सिनेमा व्यापार का एक माध्यम है, यह एक उद्योग जगत है, जहां करोड़ों और अरबों का कारोबार होता है ।  फिल्म निर्माण का मूल उद्देश्य धन अर्जित करना ही है, किन्तु ऐसे कारोबारियों मे कुछ ऐसे होते हैं जो इस सशक्त जन -माध्यम के सामाजिक सरोकारों के प्रति ईमानदारी से अपने नैतिक दायित्व का निर्वाह करते हैं । विमल रॉय, महबूब खान, सत्यजित रॉय, बी आर चोपड़ा, ऋत्विक घटक, श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, ऋतुपर्णों घोष, आदि ऐसे ही फ़िल्मकार हुए हैं जिन्होंने सामाजिक- नैतिक मूल्यों को भारतीय संदर्भ मे अक्षुण्ण रखने के प्रयास से बेजोड़ संदेशात्मक और सुधारवादी फिल्में बनाईं । फिल्म का अंतर्निहित उद्देश्य सामाजिक सरोकार भी होता है । मनोरंजन के साथ इसका उद्देश्य परोक्ष रूप से दर्शकों में देश, काल, वातावरण के प्रति  जागरूकता प्रदान करना भी होता है । दुर्भाग्य से आज सिनेमा निर्माण और निर्देशन का नजरिया विशुद्ध बाजारवादी हो गया है ( कुछ अपवादों को छोड़कर ) ।  केवल सस्ते ओछे मनोररंजन के फार्मूले तैयार किए जा रहे हैं इन और उन्हीं से करोड़ों की वसूली ही फिल्म निर्माताओं का शगल बन गया है । आज भारतीय सिनेमा अधिकाधिक क्राइम थ्रिलर, एक्शन कॉमेडी, हॉरर, से भरपूर सस्ते मनोरंजन को परोसने वाली छवि निर्मित कर चुका है । अब, कभी कभार ही एकाध स्वच्छ साफ सुथरी, परिवारसहित देखने योग्य फिल्म  मिल जाती है । सिनेमा का तकनीकी विकास, सिनेमा घरों के स्वरूप मे परिवर्तन, मल्टीप्लेक्स मल्टी स्क्रीन मॉल संस्कृति का उदय आदि कारण हैं जिसने सिनेमा कीकलात्मक अभिव्यक्ति को प्रभावित किया है । हॉलीवुड में  भी अब केवल साइंस फिक्शन पर आधारित फिल्में ही अधिक निर्मित होती हैं । उनके कोश में भी सामाजिक, ऐतिहासिक, पारिवारिक संबंधों और प्रेम संवेदनाओं के कथानक चुक गए हैं । इसीलिए सन् 60 के दशक से पूर्व का युग ही विश्व सिनेमा का सुवर्ण युग माना जाता है । चाहे वह भारतीय सिनेमा हो या हॉलीवुड सिनेमा - दोनों ही का सिनेमा का समाजशास्त्र अब बदल गया है । सिनेमा से धीरे धीरे कलात्मक अभिव्यक्ति दूर होती चली जा रही है । यह एक चिंता का विषय है ।उपर्युक्त विसंगतियों के बावजूद राजश्री निर्माताओं ने हिंदी सिनेमा को भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़कर रखा । ताराचंद बड़जात्या के बाद सूरज बड़जात्या ने राजश्री संस्था की बागडोर संभाली और वे उसी भारतीयता को कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है जो उनके घराने की विशेषता रही है । 'मैंने प्यार किया, हम आपके हैं कौन, हम साथ साथ हैं और विवाह ' फिल्मों ने भारतीय सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों और परम्पराओं को पुनर्जीवित कर दिया जो कहीं विलुप्त हो रही हैं । इसी क्रम मे इस बार सूरज बड़जात्या के ही निर्देशन में एक और ब्लॉक बस्टर फिल्म बनी है - प्रेम रतन धन पायो ।
इस बार सूरज बड़जात्या ने जो स्वयं इस फिल्म के निर्माता और पटकथा लेखक भी हैं, एक अलग तरह की कहानी चुनी है । 'प्रेम रतन धन पायो 'कई अर्थों मे राजश्री फिल्मों की लीक से हटकर फिल्म है । पहली बार सूरज बड़जात्या ने एक राजघराने के पारिवारिक कलह को फिल्म का विषय बनाया है । यह भी पहली बार हुआ है कि सूरज बड़जात्या ने एक पूर्व निर्मित हॉलीवुड की सन् 1952 मे निर्मित फिल्म ' द प्रिजनर ऑफ जेंडा ' को हिंदी मे थोड़े से फेर बदल के साथ पुनर्निर्मित ( रिमेक ) किया है । वास्तव मे इस फिल्म का भारतीयकरण कर दिया गया है । उपर्युक्त फिल्म एन्टोनी हॉप नामक कथाकार के द्वारा रचित ऐतिहासिक उपन्यास पर आधारित है । प्रीतमपुर के युवराज विजय सिंह (सलमान खान ) का राजतिलक, उनकी सगाई देवघर की राजकुमारी मैथिली ( सोनम कपूर ) से निश्चित हुई
है ।  युवराज विजयसिंह की दो सौतेली बहनें रियासत की संपत्ति मे अपना आधिकारिक हिस्सा पाने के लिए रूठकर चली गई हैं और वे युवराज से अपना हक मांगने के लिए कानून की धमकी देती है । युवराज विजय सिंह इस गुत्थी को सुलझाने मे असमर्थ दिखाई देते हैं । राजघराने के इस कलह से लाभ उठाते हुए रियासत को हथिया लेने के लिए युवराज के सौतेले भाई अजय सिंह ( नील-नितिन मुकेश ) अपने अनुचरों सहित युवराज के खिलाफ षडयंत्र रचते
हैं । राजतिलक से ठीक पहले युवराज पर एक घातक हमला होता है । राजघराने के विश्वासपात्र दीवान साहब युवराज को घायल अवस्था मे बचा लेते है और उनका उपचार एक खुफिया गुफा मे करवाने लगते हैं । राज घराने पर संकट आ पड़ता है । राजकुमारी मैथिली देवी (सोनम कपूर ) सगाई के लिए प्रीतमपुर पहुँचने वाली होती है और उनकी आगवानी करने के लिए युवराज का मौजूद होना आवश्यक था । इन स्थितियों मे दीवान साहब को अयोध्या की एक रामलीला मंडली का कलाकार 'प्रेम दिलवाला ' (सलमान खान - दोहरी भूमिका में ) मिल जाता है । दीवान साहब प्रेम दिलवाला को युवराज के रूप मे सारी तैयारियों और सावधानियों के साथ राजकुमारी मैथिली देवी से भेंट करावा देते हैं । कहानी के अंत तक प्रेम दिलवाला राजकुमारी के साथ युवराज के रूप में बहुत ही प्रभावशाली मनमोहक अभिनय करता है ।राजकुमारी मैथिली देवी जिसके मन में  युवराज वियजयसिंह के लिए एक कड़ुवाहट भरी यादें समाई हुई थीं औ जो एक तरह से स्वयं को इस वैवाहिक संबंध से मुक्त कर लेना चाहती थी, वह युवराज के रूप में उसका साथ देने वाले प्रेम दिलवाला के आत्मीय, प्रेमपूर्ण व्यवहार से प्रभावित होकर उससे प्रेम करने लग जाती है ।प्रेम दिलवाला युवराज के भेष मे उनकी बहनों की मांगों को भी पूरा कर राजघराने की उस समस्या को हल कर देता है जिस कारण युवराज विजयसिंह का परिवार टूट रहा था ।  असली युवराज को वापस लौटा लाने की कहनी रोचक है जो अंत में अपने स्थान पर पहुँचते हैं और प्रेम दिलवाला को राजमहल से कृतज्ञतापूर्वक विदा करते हैं । किन्तु मैथिली देवी के मन में तो प्रेम दिलवाला ही युवराज की शक्ल मे बसा हुआ था । मैथिली देवी की प्रेम कहानी को उसके सही मुकाम तक पहुंचा दिया जाता है । युवराज  स्वयं मैथिली देवी को लेकर प्रेम दिलवाला को सौंपने के लिए अपनी बहनों सहित पहुँचते हैं और फिल्म सुखांत हो जाता है ।
ताराचंद बड़जात्या ने हमेशा की ही भांति पारिवारिक मूल्यों की रक्षा करते हैं । राजा और प्रजा के बीच अंतराल को समाप्त करते हुए राजकुमारी का विवाह एक साधारण व्यक्ति से करने की पहल करते हैं । फैमिली को बचाने ही हर व्यक्ति का कर्तव्य होना चाहिए - यह सीख देते हैं । भाग्यवान वह होता है जिसकी फैमिली होती
है ।  फैमिली मे प्यार होता है तो रूठना और मनाना भी होता है  । परिवार में सुख और शांति बनाए रखने के लिए भाई और बहनों में प्यार का होना आवश्यक है । परिवार की संपत्ति में बहनों को शामिल करना, भाईयों का कर्तव्य है । इस तरह की   संदेशात्मकता फिल्म की कहानी में अंतर्निहित है ।
इस फिल्म की कहानी राजघराने की पृष्ठभूमि पर  आधारित है इसलिए बहुत ही भारी और आलीशान,  महंगे सेटों का निर्माण किया गया जो कि फिल्म में बहुत ही आकर्षक बन पड़े हैं । एक से एक खूबसूरत परिधान, भव्य अलंकरण से युक्त महल की साजसज्जा, मैथिली देवी का आकर्षक व्यक्तित्व फिल्म मे चार चाँद लगा देता है । हिमेश रेशमिया का संगीत निर्देशन वास्तव मे प्रशंसनीय है । इस फिल्म का शीर्षक गीत प्रेम रतन धन पायो - दर्शकों और संगीत प्रेमियों की पहली पसंद बन चुका है । फिल्म के गीतों और संगीत मे लोकतत्व की प्रधानता है । रामलीला का मंचन और उसका गीत मनोहारी है जो ठेठ लोक संस्कृति को उजागर करता है । सलमान ने युवराज और प्रेम दिलवाला की दोहरी भूमिका बहुत ही  कलात्मकता से निभाई है । सोनम कपूर राजकुमारी मैथिली देवी के रूप में एक सुकोमल सौन्दर्य को धारण किए हुए है । फिल्म की सिनेमाटोग्राफी उत्कृत्ष्ट कोटि की है। रंगों का चयन नयनाभिराम है । फिल्म में राजघराने की भव्यता प्रदर्शित करने  के लिए एक शीशमहल
का दृश्य है जो की सुंदर तो है किन्तु अनावश्यक लगता है । शीशमहल के प्रसंग तक आते आते दर्शकों में फिल्म के क्लाईमेक्स की उत्कंठा बढ़ जाती है इसलिए यह उबाऊ लगता है ।
फिल्म का पूर्वार्ध थोड़ा शिथिल सा है किन्तु उत्तरार्ध में अधिक रोचक और वेगवान है । फिल्म की पटकथा कुछ जगहों पर भटक गई है और शिथिल सी लगती है । फिल्म की अवधि तीन घंटे है जो कि बहुत अधिक है इसे ज्यादा से ज्यादा अढ़ाई घंटे में समेटा जा सकता था । सूरज बड़जात्या ने हॉलीवुड की फिल्म प्रिजनर ऑफ जेंडा ( 1952 ) की याद ताजा कर दी । अंतत: यह निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सूरज बड़जात्या ने एक बार फिर समूचे परिवार के लिए एक मनोरंजन से भरपूर संदेशात्मक, मधुर संगीत से युक्त फिल्म सिनेमा प्रेमियों को दिवाली के अवसर पर दी है । 

Tuesday, November 17, 2015

पेरिस में आतंकी हमले : मानवता को शर्मसार करने वाली कायरतापूर्ण बर्बरता है

पेरिस मे हुए आतंकी हमले ने सारी दुनिया को हिला कर रख दिया है । आखित मनुष्यता किस दिशा में जा रही है ? मनुष्य सभ्यता का क्या गंतव्य है ? निर्दोष और निहत्थे नागरिकों की अमानुषी हत्या से कोई भी समनूह कुछ नहीं हासिल कर सकता । कोई भी विचारधारा, चाहे वह अतिवादी हो या उदारवादी, धार्मिक, सांप्रदायिक हो, या राजनीतिक अथवा दार्शनिक, हिंसा से मनुष्य  और मनुष्यता  नष्ट हो जाएगी, सारी दुनिया वीरान हो जाएगी फिर जब कोई नहीं बचेगा तब ये तथाकथित हमलावरों का कौन सा राज स्थापित होगा और वे किन पर राज करेंगे । आई एस आई एस (ISIS ) की मंशा कभी पूरी नहीं हो सकती, जब तक की वह अपने विचारोंकों संवाद के रूप मे दुनिया के सामने नहीं प्रस्तुत करता । इस तरह के आतंकवाद का सामना करें के लिए सारी दुनिया को एकजुट होकर आपसी राजनीतिक वैचारिक मतभेद को ताक पर रखकर कोई स्थाई और कारगर समाधान तलाशना होगा । खून का बदला खून से लेना बहुत आसान है किन्तु यह हिंसा को और अधिक बढ़ावा देगा,जैसा कि हो रहा है । मानवता मर रही है । निर्दोष लोग व्यर्थ मे मारे जा रहे हैं । इस तरह के खिफ़्या हमलों को रोक पाना किसी भी सरकारी तंत्र के लिए कठिन है चाहे वह सरकार कितनी भी ताकतवर और चुस्त क्यों  न हो । यूरोपीय देश सभी अति सम्पन्न और समर्थवान देश हैं, जहां की सैन्य और पुलिस व्यवस्था तीसरी दुनिया के गरीब देशों के सैन्य व्यवस्था से कहीं अधिक विकसित और समुन्नत हैं । इन देशों का खुफिया तंत्र भी अति विकसित है । फिर भी ऐ। से हमलों के बारे में इन्हें भनक भी नहीं मिल रही है । यह एक चुनौती है । यह चुनौती सभी देशों के लिए है । भारत जैसे देश के लिए यह और भी बड़ी चुनौती हो सकती है ।
पेरिस मे मारे गए नागरिकों के प्रति सारा विश्व शोक संवेदनाएँ व्यक्त कर रहा है, जो कि आवश्यक है । हम सब दुखी हैं और चिंतित भी हैं । यह दुख की घड़ी है जब सारी मानवता को एक हो जाना चाहिए । यह हमला मानवता पर हुआ है । पेरिस यूरोपीय सभ्यता और  संस्कृति का केंद्र माना जाता है । यहाँ हर धार्मिक और सांस्कृतिक समुदाय के लोग निवास करते हैं । यह एक सु सम्पन्न देश  है । कला, संस्कृति, फैशन, साहित्य का प्राचीन, मध्य युगीन  और आधुनिक का संगम स्थल है ।  ऐसी सांस्कृतिक नागरी के शांत जीवन के ताने बाने को तार तार कर देना अत्यंत पीड़ादायक है । पेरिस वासियों के दुख में हर कोई शामिल है । इसमें कोई संदेह नहीं । ऐसे नर मेध की निंदा हम सब कड़े शब्दों मे निंदा करते हैं और खंडन भी करते हैं । भारत एक शांतिप्रिय देश है जहां की संस्कृति भी पेरिस की तरह ही सम्मिश्रित संस्कृति है ।  सहनशीलता और सहिष्णुता मे भारतीय संस्कृति बेजोड़ रही है । इसे बनाए रखना है ।