Wednesday, October 5, 2011

देश का सरकारी तंत्र कितना भोला है ?

भारत सरकार ने देश की गरीबी रेखा तय करने के लिए जो फार्मूला अपनाया है वह न केवल हास्यापद है बल्कि अत्यंत लज्जाजनक तथा अपमानजनक भी है। मान्टेक सिंह आहलूवालिया जैसे तथा कथित अर्थ शास्त्री और प्रधान मंत्री के वित्त सलाहकार कहे जाने वाले मेधावी वित्त प्रबंधक के नेतृत्वा में भारतीय आर्थ प्रणाली की इस तरह की विडम्बना -पूर्ण व्याख्या बहुत हीआक्रोशजनक है। देश की जनता दुखी है इस तरह की सूचनाओं को जाकर। भला हो मीडिया का जो आजकल हर छोटी और बड़ी सूचनाओं को देश वासियों के समक्ष उजागर कर रहा है। सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत भी बहुत साँरी महत्वपूर्ण सूचनाएं आज जनता तक पहुँच रहीं हैं इसीलिए बहुत सारे घोटाले जनता के विचार-क्षेत्र में आ रहे हैं। गरीबी की रेखा को तय करने के लिए शहरी आदमी की आय ३२/- रुपये और ग्रामीण इलाकों में रहने वालों के लिए महज २५/- रुपये तय करना कितना अमानवीय है और क्रूर है इसका अंदाजा हम इसी से लगा सकते हैं कि जब यह खबर सामने आयी तो वित्त मंत्रालय में हड़कंप मच गया और सारे वित्त प्रबंधकों ने तत्काल उसकी सफाई दे डाली कि ये आंकड़े सही हैं और इसे उचित सिद्ध करने के तकनीकी कारणों को रेखांकित करने में लग गए। ( यहाँ मान्टेक सिंह साहब की सक्रियता भी गौरतलब है ) । किसी ने बहुत सही चुनौती दे दी उनको कि वे ३२/- रुपये में एक दिन गुज़ार कर दिखाएँ इस देश में आज की तारीख में। सरकार को इस बात का भय है कि अगर इस राशि को बढ़ा दिया जाए तो गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या में भारी इजाफा हो जाएगा जिससे देश की तथा कथित ( कृत्रिम ) छवि बिगड़ जायेगी.इन ३२/- रुपयों में प्रतिदिन के अनुमानित खर्च का आबंटन भी बहुत उदारता के साथ दर्शाया गया है। जिसमें भोजन के अलावा, मकान का किराया, बच्चों की पढाई का खर्च, नौकरी के लिए आवागमन का खर्च, कपड़ों का खर्च आदि शामिल हैं। यह निर्धारित राशि कितनी मजाक उडाती है, हमारे लोकतंत्र का। जब कि सस्ता खाना केवल भारत के संसद भवन में केवल सांसदों को ही उपलब्ध है वह भी रियायती कीमतों पर। ३२/- रुपये वाला खाना बढ़िया खाना केवल संसद भवन के भोजनालय में उपलब्ध है जहां आम आदमी सपने में नहीं पहुँच सकता। हमारे देश का अमीर सांसद सबसे सस्ता भोजन संसद में करता है जब कि उनका करदाता ( जिसके पैसे से ये सांसद मन पसंद महँगा भोजन करते हैं ) भूखे और नंगे रहते हैं। वाह रे लोकतंत्र तेरी दुहाई है दुहाई। सांसदों के ऐशो आराम का सामान आम आदमी अपना पेट काटकर अनेकों तरह के त्याग और परिश्रम से जुटाता है और वह खुद भूखा रह रहा है। आज कि बढ़ती हुई महंगी के प्रति कोई भी राजनेता संवेदनशील नहीं दिखाई देता। राजेंता आम आदमी को, सरकारी कर्मचारियों को अपने स्वार्थ के लिए जन आन्दोलनों में झोंक देते हैं, उन्हें कार्यालयों में काम से बहिष्कार करने के लिए उकसाते हैं ( भड़काते हैं ), बिना वेतन के हड़ताल करने के लिए मजबूर करते हैं और जब महीने के अंत में उन्हें काम बिना वेतन नहीं - की मार झेलनी पड़ती है तो ये नेता अपना पल्ला झाड लेते हैं। राजनेताओं के लिए ऎसी कोई शर्त लागू नहीं होती। उन्हें हर महीने ( कम से कम एक लाख रूपये ) वेतन के रूप में प्राप्त हो ही जाता है। आज सरकारी कर्मचारी से लेकर निजी क्षेत्र के अनेकों कर्मचारी और अधिकारी गण ऐसे ही एक बड़े आन्दोलन का हिस्सा ( जबरदस्ती ) बनाए गए हैं उनका वेतन कट गया है। वे लाचार और बेबस हैं, उनसे जबरदस्ती इस नि:सहाय स्थिति को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया है। जब कि सांसद और विधायक अपना पूरा वेतन ले रहे हैं। अब देखना है कि केंद्र सरकार इस गरीबी की रेखा के लिए कितनी राशि निर्धारित करती है ( पुनर्विचार तो करना ही होगा ) इनकी क्या समझ है। ऐसे निर्णयों पर सरकार के सारे प्रतिनिधि खामोश क्यों रहते हैं। आम आदमी हमारे देश का बहुतही लाचार और बेबस है । उसे सहनशीलता का अमृत पिला दिया गया है। वह सब कुछ सह लेता है और अपनी नियति मानकर ज़िंदगी बसर कर लेता है।
इस विषय पर सही सोच वाले नागरिकों की बहुत तीखी प्रतिक्रया सामने आयी है। अब धीरे धीरे देश जाग रहा है।
( ऐसा कभी कभी अचानक लगने लगता है ) अन्ना हजारे जैसे सामाजिक कार्यकर्ता और आन्दोलन कारियों ने इधर हमारे देश की सामान्य जनता को भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने की ताकत दी है और इस महामारी से मुक्त होने के लिए सारे देश ओ संगठित किया है। अंतत: एक ऐसा नेतृत्व उभरकर सामने आया है जो कि आगामी दिनों में कारगर उपाय निकाल लेगा, देश की ऎसी समस्याओं से जूझने का। आज हमें अपने नेताओं को उनके कर्तव्य को याद दिलाने का अवसर आ गया है। लोगिन में धीरे धीरे हिम्मत जुट रही है लेकिन अभी बहुत लम्बी दूरी तय करनी है। साधारण लोगो का विश्वास सरकारी तंत्र पर से पूरी तरह से उठ गया है। इसे फिर से बहाल करने के लिए हमें व्यवस्था में परिवर्तन लाना होगा। अन्ना ने सही कहा है कि हमें एक और आजादी की लड़ाई लड़नी है। हमें भ्रष्टाचार मुक्त समाज के स्वरुप को साकार करने के लिए परस्पर विभेदों को भुलाकर एक जुट होना पडेगा, जो कि कठिन है लेकिन असंभव नहीं। अब वह समय आ गया है जब हम अपने जन - प्रतिनिधियों को उनके कर्तव्य की याद दिलाएं ।
हमें देश में हर स्तर पर सुशासन की आवश्यकता है जो आज तक हमें उपलब्ध नहीं हुई। लेकिन अब समय आ गया है कि हम अपने राजनेताओं से ( जो कि जनता के सेवक भी हैं ) सुशासन की मांग करें और उनसे सुशासन ही करवाएं।
( गुड गवर्नेंस ) अन्ना हजारे ने जनालोकपाल बिल को अगले शीतकालीन सत्र में संसद में प्रस्तुत करने की मांग की है, अन्ना हजारे की इस मांग में सारादेश शामिल है। आज अन्ना की आवाज देश कीआवाज बन गयी है। निश्चित रूप से अन्ना की यह आवाज और अन्ना का यह दृढ संकल्प सरकार के लिए चेतावनी है। अन्ना ने देशवासियों को आन्दोलन का नया अर्थ दिया है। आन्दोलन का अर्थ हिंसा या तोड़फोड़ नहीं होता। आन्दोलन का अर्थ विरोध प्रदर्श लेकिन शालीन और शांतिपूर्ण तरीके से, बातचीत के जरिये अपनी मांगों को मनवाने का तरीका ही आज का जन आन्दोलन होना चाहिए। इस प्रक्रिया में निश्चित ही समय लगता है। दोनों पक्षों को एक आम सहमति बनानी पड़ती है। आम सहमति से ही विभेद सुलझाते हैं। आम सहमति ही सब विभेदों का हल हो सकती है ।

Thursday, June 9, 2011

अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति तत्काल की जाये

अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद में पिछले एक वर्ष से कुलपति का पद रिक्त पडा हुआ है .
केन्द्र सरकार के द्वारा शासित यह विश्वविद्यालय पिछले एक वर्ष से सरकार की घोर उपेक्षा का शिकार बना हुआ है.
नियमित कुलपति की अनुपस्थिति में विश्वविद्यालय का अकादमिक, प्रशासनिक तथा विकास का सारा कार्य ठप्प हो गया है.
एम वर्ष से भी ज्यादा अवधि से प्रशासन में ठहराव की स्थिति उत्पन्न हो गयी है. नित्यप्रति नई नई समस्यायें पैदा हो रही हैं जिनका
समाधान तत्काल न होने के कारण प्रशासन और कर्मचारियों में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गयी है जिसके परिणाम स्वरूप
इधर कुछ दिनों से शिक्षकेतर कर्मचारीगण अपनी कुछ मांगों को लेकर अनिश्चित कालीन हडताल/आन्दोलन पर अडे हुए हैं, जिसका
समंजस समाधान न होने के कारण विश्वविद्यालय का अकादमिक, परीक्षा-संबंधी कामकाज रुक गया है. कुलपति के ही साथ विश्वविद्यालय
के कुलसचिव का पद भी रिक्त पडा है जिस पर नियुक्ति की अनिवार्यता है. दोनों ही पद विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए अतिप्रमुख होते हैं .
देश में अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यलय का एक महत्वपूर्ण स्थान है, यह राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय महत्व का विश्वविद्यालय है जो कि सारे देश भर में
विधेसी भाषा एवं साहित्य के अध्ययन, अध्यापन तथा शोध के लिए जाना जाता है. यूरोपीय भाषाओं के अध्ययन, अध्यापन एवं शोध के साथ साथ, विभिन्न विदेशी भाषाओं के मध्य अनुवाद तथा तुलनात्मक- शोध तथा तुलनात्मक भाषा-विग्यान के अध्यापन के लिए यह वि वि विश्व विख्यात रहा है. यहां देश विदेश से बडी संख्या में विद्यार्थी विदेशी भाषाओं ( और अंग्रेज़ी भाषा तथा साहित्य) में महारथ हासिल करने के लिए दाखिला लेते हैं. विश्वविद्यालय का परिसर में समन्वयात्मक अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश का बहुत ही सुन्दर परिद्रिश्य दिखाई देता है. ऐसा विश्वविद्यालय दुर्भाग्य से सरकार की उपेक्षा का शिकार हो गया है . केन्द्र सरकार को इस विश्वविद्यालय के शैक्षिक विकास को पुन: पटरी पर लाने के लिए शीघ्र ही कुअलपति तथा कुलसचिव की नियुक्ति के लिए आवश्यक कार्यवाही करनी चाहिए. कुलपति के चयन की प्रक्रिया जटिल और संश्लिष्ट होती है इसीलिए इसमें काफ़ी समय भी लग जाता है. किन्तु यदि सरकार चाहे तो किसी भी जटिल काम को सरल भी कर सकती है. सरकार की तत्काल कार्यवाही इस विश्व-स्तरीय विश्वविद्यालय की शैक्षिक प्रगति को अवरुद्ध होने से बचा सकती है .

अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद में पिछले एक वर्ष से कुलपति का पद रिक्त पडा हुआ है .

Wednesday, June 8, 2011

A premium Central University without a Vice Chancellor for an year and The Government does not bother to appoint one !

The English and Foreign Languages University, established by an act of parliament with a vision to offer World Class Language and Literature teaching in English and Foreign Languages, is now facing a strangled death situation due to sheer negligence of the Ministry of HRD, which has the responcibility of providing infrau-structure as well as adequate teaching and Non-teaching staff. Unfortunately the Government has totally forgotten to take this university in to cognisense even to appoint a new Vice-Chancellor ever since the former Vice-Chancellor completed his tenure and relinquished office one year ago. Due to the Callous and careless attitude,the central government has driven the University in to total disarray and confusion, without any direction and total management failure. The day to day problems are increasing and sometimes the the very serious probles of grave nature have become very common. The University has come to a grinding halt without any developpment in the absence of a fulfledged Vice-Chancellor. The unrest among the Non-teaching staff has gone to the extent of frequent protests and strikes which brings the university administration to a grinding halt. Students problems are causing regular hinderence to the academic progress of the prestigious University. The development of infrastructure has come to a halt due to lack of decision making authority. New academic year is in the offing and the admission process is threatened due to dead-lock between the University authorities and the Non-teaching staff over an issue of excess payment and its recovery. The Incharge
Vice-Chancellor ( VC of MAANU ) has been very kind and considerate to look in to the situation and has been trying his best to sustain the regular activities of the University, but due to his preoccupations in his own University it becomes difficult for him to give full time to this newly established University, which demands a full time Vice-Chancellor of its own. There have often studetn's unrest due to various problems and also due to the effect of the ongoing agitation which has been spearheaded by the neighbouring University campus. The OU Campus exerts a lot of plolitical pressure on the EFL-U Campus in many ways which also becomes detrimental to the academic activities of the the University. One Year of vaccum without a regular vice-chancellor for such a premium istitution of national importance and of international recognition is pathetic and deplorable.The Government should act immediately on priority basis and appoint regualr vice-chancellor to bring back the university on to the track, so that the losses which have occured during the last one year may be compensated.

सत्ता बनाम देश बचाओ आन्दोलन

देश में भ्रष्टाचार के विरोध में तीव्र आक्रोश अपने चरम पर आ पहुंचा है । भ्रष्टाचार विरोधी सुनामी भारत में दस्तक दे चुकी है इसे अब कोई नहीं रोक सकता। आम जनता किसी भीतरह की कुर्बानी देनेके लिए सन्नद्ध हो गई है। लोगों ने कमर कास लिया है। भ्रष्ट राजनीति और देश कि नौकरशाही व्यवस्था के साथ साथ अपराधीकृत राजनीति का घिनौना रूप अब बेनकाब हो गया है। घोटालों की राजनीत अब अनावृत्त हो चुकी है। नामी गिरामी उद्योग घराने से लेकर व्यावसायिक दलालों का भंडाफोड़ हो गया है। न्यायपालिका अपना काम करने के लिए कमर कास ली है। आम जनता में देर से ही सही एक जनचेतना जाग गयी है। सताधारी राजनेता की नींद उड़ गयी है। सता पक्ष जन आन्दोलन को कुचलने के घिनौने हथकंडे अपना रहे हैं वह भी बेशर्मी से। रातों रात निहथ्थे, निर्दोष आम लोगों पर सशस्त्र बल अपना पौरुष प्रदर्शन करते हैं। तथाकथित गांधीजी और नेहरूजी के सिद्धांतों का पालन करने का ढोंग करने वाली तथाकथित वाली सरकार इन निहत्थों पर बल प्रयोग करते हुए ज़रा भी शर्मसार नहीं हुई। प्रधान मंत्री महोदय अनभिज्ञता की गहरी नींद सो रहे हैं। वे करें भी तो क्या, तंत्र के धागे तो किसी और के हाथों में हैं । जन समर्थित हर आन्दोलन ऐसे ही रौंदा जाता है। जन समर्थित आन्दोलन को कुचलने के लिए उसे किसी न किसी सता विरोधी राजनीतिक दल से जोड़ दिया जाता है और उसे सिद्ध भी कर दिया जाता है। सत्ता के खेल निराले होते हैं। सत्ता का विरोध, जनता के कल्याण के लिए जब किया जाए वह तब - लोकतंत्र में जायज़ होता है। लेकिन आज की हमारी सरकारें ( जो कि जनता द्वारा चयनित प्रतिनिधियों की सरकार है ) अपने आप को तानाशाही संस्कृति में ढाल चुकी है । बहुत दुःख होता है ऎसी परिस्थितियों को देखते हुए। क्या आम आदमी का कोई अधिकार ही नहीं रहा - इस देश में। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव - चाहे किसी भी विचारधारा के हों - हैं तो वे आम नागरिक ही। विरोध का स्वर दबाने के लिए सत्ता पक्ष के नेता हमेशा गड़े मुर्दे उखाड़ते हैं और सवाल का जवाब पलट वार करके करते हैं। सवाल पूछना के लिए लोकतंत्र में किसी भी अर्हता या योग्यता या पात्रता की आव्यशाकता नहीं होती लेकिन जब भी कोई सरकार को उनकी गलत नीतियोंके लिए ललकारता है तो उसे उत्पीडित किया जाता है, उसे तरह तरह से सताया जाता है,उसकी संपत्ति जब्त कर ली जाती है, उस पर अनेक तरह के आपराधिक मामले दर्ज कर दिए जाते हैं और उसे देश द्रोही सिद्ध कर उसे ख़त्म कर दिया जाता है। लोगों में भय और आतंक का वातावरण उभर कर आ रहा है। सत्ता पक्ष लोगों को मासिक रूप से अपंग बनाना चाहती है। हर राजनीतिक दल का यही एजेंडा है। कोई भी दल आम आदमी अथवा देश में व्याप्त अराजकता, महंगाई, विदेशों में छिपाए काले धन की समस्या, सरहद पार के आतंकवादी हमले आदि के बारे कोई भी समाधान नहीं निकालना चाहते है , केवल भोली भाली जनता को सत्ता और विपक्ष की लड़ाई में उलझा कर रख देना चाहते हैं। आम आदमी के पास केवल अपनी रोज़ी रोतीकमानेभर का ही समय बड़ी मुश्किल से मिल पाता है, वह उपरोक्त समस्याओं में कहाँ से उलझेगा। उसे उम्मीद रहती है अपने जन प्रतिनिधियों से - लेकिन वे कितने भ्रष्ट हैं - इसे अलग से बताने की आवश्यकता नहीं है।
पिछले दिनों की घटनाओं को सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी अपनी राजनीति का मुद्दा बनाकर जनता को गुमराह कर रहे हैं। जन लोकपाल विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने के लिए जो प्रयास हो रहे हैं, उसमें काफी अड़चनें सरकार पैदा कर रही है - यही बात जनता को समझ में आती है। सरकार क्यों इस विधेयक को जनता के अनुकूल मांगों के अनुकूल स्वीकार नहीं करती - इसका उत्तर सरकार क्यों नहीं देना चाहती ? क्यों सरकार जनता की आवाज़ को दबाना चाहती है। जब राजनेता ( सत्ता और विपक्ष - दोनों पक्षों के ) भ्रष्टाचार में डूबे हों तो वे कैसे ऐसे विधेयक को स्वीकार करेंगे जो उनके ही विरुद्ध कार्रवाई करने वाली हो । लेकिन अब समत आ गया है कि सरकार को जनता के हर सवाल का जवाब देना ही पडेगा।
राष्ट्रीय संकट के समय या राष्ट्रीय मुद्दों पर हमारे देश के राजनीतिक दल एकजुट कभी नहीं होते। विदेशों में ऐसे मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष दोनों एकजुट होकर परस्पर दोषारोपण की राजनीति न करते हुए, देशवासियों के हित में समाधान ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं । अनेक अवसरों पर दोनों पक्ष एक ओर हो जाते हैं। लेकिन हमारे देश हमने कभी ऎसी स्थिति नहीं देखी। ( सिवाय बाहरी आक्रमण की स्थिति को छोड़कर ) ।
आज देश बहुत ही गहरे संकट से गुज़र रहा है। कई लाख -करोड़ रुपयों की राशि ( राष्ट्रीय संपत्ति ) काले धन के रूप में अवैध तरीके से विदेशी बैंकोंमेंजमा है जिससे राष्ट्र की सारी गरीबी दूर की जा सकती है, भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुँच चुका है, यह ऐसा समय है जब कि सभी को एकजुट होकर इस धन को वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए । साथ ही देश के भीतर दमनकारी नीतियों का रास्ता छोड़कर जनता के हित में सत्ता को नीतिगत निर्णय लेने का साहस होना चाहिए।
किसने सोचा था कि गांधी, नेहरू, अम्बेडकर,फुले, दयानंद सरस्वती, टैगोर का यह देश आज ऎसी दीन और दयनीय स्थिति में होगा जहां केवल भ्रष्ट राजनीति ही देश का वर्तमान और भविष्य हो ।
हम सामान्य वर्ग के अति सामान्य नागरिकों को कब इस महामारी से मुक्ति मिलेगी।
दाई में ula

Sunday, April 3, 2011

भारत विश्व कप - विजेता

२ अप्रैल २०११ भारतीय खेल इतिहास में एक ऐतिहासिक दिन और रात के ९ बजाकर ३० मिनट पर सारा देश थम गया। एक सौ बीस करोड़ लोग एक साथ देश के कोने कोने से जश्न और उत्सव के रंग में रंग गए। प्रादेशिक, भाषिक, मज़हबी और सांस्कृतिक विभेदों से ऊपर उठाकर सारे देश ने एक जुट होकर इस टीम इंडिया की जीत को हृदय की गहराइयों से अनुभव किया और देश के लिए एक होकर समर्पित हो गए - इस महान क्षण को अपने मन-मस्तिष्क में हमेशा हमेशा के लिए समाने के लिए। सारा देश इस इतिहास का हिस्सा बन गया। क्रिकेट की इस जीत ने सारे देश को एक कर दिया। सारे भेद-भाव मिट गए, छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष, आबाल-वृद्ध, हरेक ने इस खेल भावना को जिया और साकार किया। इस खेल ने देश में वह एकता भर दी जिसे पहले कभी देशवासियों ने अनुभव नहीं किया। ऐसे भी लोग जो क्रकेट से मुंह चिढाते थे वे भी क्रिकेट के इस अभूतपूर्व वातावरण में विलीन हो गए। आज हर देशवासी भारतीय टीम की इस ऐतिहासिक जीत से गौरवान्वित हुआ है और अपार गर्व का अनुभव कर रहा है। निश्चित ही यह जीत विश्व में भारतीय खेलों का एक नया इतिहास रचेगा। भारत का क्रिकेट प्रेम आज विश्व भर में गौरव और आदर का पात्र बन गयाहै। भातीय टीम की इस जीत के पीछे देश के १२० करोड़ लोगों की भावनाएं साथ रहीं। यह एक अति-विशिस्ट उपलब्धि का समय है। क्रिकेट एक अनिश्चितताओं का खेल है इसमें सफलता हासिल करना आज विश्व मंच पर एक अनूठी चुनौती है। इस खेल के नियम भी निराले हैं। सन १९८३ से लेकर आज तक इस खेल के प्रारूप कमें कई बदलाव आये हैं। आज का प्रारूप ( एक दिवसीय खेल का ) पहले से बहुत अलग हो गया है, बल्कि यह कहना होगा इसे अधिक कठिन तथा चुनौतीपूर्ण बना दिया गया है। इसमें रोमांच का पुट अब अधिक बढ़ गया गई। मैच के आखिरी गेंद तक भी हार-जीत का फैसला नहीं हो पाता है - लोग तनाव में आ जाते हैं। यह तनाव असहनीय भी हो जाता है जिस कारण कई लोगों ने अपनी जानें भी गवाई हैं । मौजूदा विश्व कप प्रतियोगिताओं में भारत जिस तरह से एक के बाद एक पडावों को पार करता हुआ जीत की ओर अग्रसर हुआ है, वह निश्चित रूप से काबिले तारीफ़ है। हमारी टीम ने सही सूझ-बूझ के साथ अपनी रन नीतियाँ तय कीं। इसमें कप्तान महेंद्रसिंह धोनी और कोच गैरी कर्स्टन का बहुत बड़ा योगदान है। फिर टीम में सचिन जैसे महान खिलाड़ी की उपस्थिति एनी खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा क़ा स्रोत बनती है। सचिन क़ा शालीन और संयमित तथा गौरवमय व्यक्तित्व अपने आप में एक विशेष अनुभूति प्रदान करता है। अचिन की मात्र उपस्थिति से साथी खिलाड़ी अपने को ऊर्जस्वित महसूस करते हैं। सचिन क़ा योगदान इस टीमके निर्माण में अद्भुत है.मैच जीतने के बाद टीम के सभी सदस्यों ने जिस खेल भावना से सचिन के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है वह अनुकरणीय है और ऐतिहासिक भी। आज के राजनेताओं को हमारी भारतीय टीम की खेल भावना से बहुत कुछ सबक लेना चाहिए। युवराज सिंह क़ा यह कथन कि सचिन ने २१ सालों तक भारतीय गौरव को अपने कन्धों पर रखकर उसे nibhaaya है तो आज उन्हें हम यह तोहफा देते हैं। इस विश्व कप को सचिन के नाम कर खिलाड़ियों ने जिस सम्मान और प्रेम का प्रदर्शन किया है वह महान मानवीय मूल्यों को दर्शाता है। वीराट कोहली का यह पहला ही विश्व कप है जिसमें उन्हें खेलने का अवसर का मिला, उनका बनही यही जज्बा गौर तलब है। खिलाड़ी जब अपने वरिष्ठ खिलादियोंके प्रति इस तरह की भावनाओं का प्रदर्शन करते हैं - इसके निहितार्थ समाज के हर वर्ग के लोगों तक पहुँचते हैं। इनमें छिपे हुए नैतिक मूल्यों की ओर एक बार हमारा ध्यान आकर्षित होता है। अभी हमारे समाज में ऐसे मूल्य बाक़ी हैं, बचे हुए हैं, जिसंकी हमें रक्षा करनी है। हमारे क्रिकेट के खिलाड़ियों ने अपने इस इस व्यवहार से देश के हर वर्ग को जागृत किया है। यह एक ऐसा अवसर है जब कि देश फिर से अपने खोते हुए नैतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय मूल्यों को वापस लौटा लाये और एक नए समाज के पुनर्निमाण की प्रक्रिया शुरू हो सके। आज सारा देश इस महान उपलब्धि से अभिभूत है, भावाकुल है, भावोद्रेग की मन:स्थिति में है। इस जीत से सारा देश गदगद हो रहा है। सारे विभेद मिट गए हैं, यही सिलसिला चलता रहे। हम अपने सारे भेद-भाव मिटा दें और एकजुट हो जायेँ एक नए समाज को साकार रूप देने के लिए। सारे देश को बधाई - टीम इंडिया के हरेक सदस्य को बधाई और उन सारे कर्मचारियों और अधिकारियों को हार्दिक बधाई जिन लोगों के अथक प्रयासों से यह उपलब्धि हमें हासिल हुई है.

Friday, April 1, 2011

देश में क्रिकेट का उन्माद

आज देश भर में क्रिकेट का बुखार अपने चरम पर है। किसी खेल के प्रति हमारे देश का इस प्रकार का जुनून काबिले तारीफ़ है लेकिन मीडिया जिस भांति इस खेल को लोकप्रिय बनाने के लिए सारे दांव पेंच लगा रही है वह चिंता का विषय है। आज खेल-कूद और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी बाज़ार का विषय बन गए हैं और केवल पैसा कमाने का माध्यम बनाकर रह गयीं हैं। सिनेमा से लेकर रंगमंच और खेल-कूद तक - सारे क्षेत्र बाज़ार के निशाने पर हैं। बाज़ार अकूत धनोपार्जन का स्रोत है। बाज़ार का सीधा समीकरण विज्ञापन की दुनिया से है। विज्ञापन और प्रचार से करोड़ों रुपयों या डालरों की कमाई मीडिया के तानाशाह कर रहे हैं। मीडिया को देश-प्रेम या राष्ट्रीय संस्कृति से कुछ लेना देना नहीं है। वह केवल पैसे के लिए ही सब कुछ करती है। समूचे राष्ट्र को किसी भी घटना के खिलाफ या तरफ लोकचेतना को बनाने में मीडिया का ही दखल है। मीडिया जो दिखाती है, छापती है, उसे ही जनता देखती है और उसे ही सच मानती है, जब की हकीकत कुछ और ही होती है। आज हमारे चारों का वातावरण मीडिया के दखल से उतीदित है। देश जी आम जनता उसी ओर लहर की ओर बहती है जो लहर मीडिया पैदा करती है। क्रिकेट के विश्व कप टूर्नामेंट का आयोजन भारत जैसे गरीब देश में होना अपने आप में एक विडम्बना है । इस खेल में जो धन लगता है और जिस रूप में इसका वितरण होता है वह भी आम लोगों के लिए अकल्पनीय है। खिलाड़ियों से लेकर प्रायोजकों और मीडिया के प्रचारकों को अपार धन राशि की उपलब्धि होती है। इस धन का उपयोग देश के विकास के कार्यों के लिए नहीं किया जाता। केवल कुछ धनी समाज के हित में ही ये खेल और इनसे प्राप्त धन का उपयोग होता है। विश्व कप के मैचों को देखने के लिए अपार जाना समूह उमड़ पड़ता है । टी वी चैनलों में रात दिन केवल क्रिकेट संबंधी कार्यक्रम ही दिखाए जाते हैं। तरह तरह की व्याख्याओं विश्लेषणों द्वारा क्रिकेट संबंधी चर्चा जारी रखी जाती है। अखबार, पत्रिकाएँ, दृश्य और श्रव्य माध्यम अहर्निश क्रिकेट का ही राग आलापते रहते हैं।


चाहे कुछ भी हो, यह खेल हमारे देश का राष्ट्रीय खेल बन चुका है। सारा देश भारत के विजय की प्रतीक्षा कर रहा है। भारत का फाइनल में पहुँचना अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इधर कुछ वर्षों से भारतीय टीम ने विजय का अभियान जो शुरू किया है, उसकी चरम परिणति विश्व कप की जीत में ही होगी। आज देश का हर व्यक्ति, हर उम्र का, इस खेल की बारीकियों को समझने लगा है. इसीलिए लोग इस खेल में रूचि ले रहे हैं। भारत - पाकिस्तान के सेमी फाईनल प्रतियोगिता ने नए कीर्तिमान स्थापित किये। फाइनल में भजी भारत की जीत को लोग निश्चित मान रहे हैं। लोगों के इस विश्वास और देश केप्रति ऐसे जज़बात के प्रति हम नमन करते हैं और कामना करते हैं कि हमारा देश विजयी हो।