Wednesday, June 8, 2011
A premium Central University without a Vice Chancellor for an year and The Government does not bother to appoint one !
Vice-Chancellor ( VC of MAANU ) has been very kind and considerate to look in to the situation and has been trying his best to sustain the regular activities of the University, but due to his preoccupations in his own University it becomes difficult for him to give full time to this newly established University, which demands a full time Vice-Chancellor of its own. There have often studetn's unrest due to various problems and also due to the effect of the ongoing agitation which has been spearheaded by the neighbouring University campus. The OU Campus exerts a lot of plolitical pressure on the EFL-U Campus in many ways which also becomes detrimental to the academic activities of the the University. One Year of vaccum without a regular vice-chancellor for such a premium istitution of national importance and of international recognition is pathetic and deplorable.The Government should act immediately on priority basis and appoint regualr vice-chancellor to bring back the university on to the track, so that the losses which have occured during the last one year may be compensated.
सत्ता बनाम देश बचाओ आन्दोलन
पिछले दिनों की घटनाओं को सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी अपनी राजनीति का मुद्दा बनाकर जनता को गुमराह कर रहे हैं। जन लोकपाल विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने के लिए जो प्रयास हो रहे हैं, उसमें काफी अड़चनें सरकार पैदा कर रही है - यही बात जनता को समझ में आती है। सरकार क्यों इस विधेयक को जनता के अनुकूल मांगों के अनुकूल स्वीकार नहीं करती - इसका उत्तर सरकार क्यों नहीं देना चाहती ? क्यों सरकार जनता की आवाज़ को दबाना चाहती है। जब राजनेता ( सत्ता और विपक्ष - दोनों पक्षों के ) भ्रष्टाचार में डूबे हों तो वे कैसे ऐसे विधेयक को स्वीकार करेंगे जो उनके ही विरुद्ध कार्रवाई करने वाली हो । लेकिन अब समत आ गया है कि सरकार को जनता के हर सवाल का जवाब देना ही पडेगा।
राष्ट्रीय संकट के समय या राष्ट्रीय मुद्दों पर हमारे देश के राजनीतिक दल एकजुट कभी नहीं होते। विदेशों में ऐसे मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष दोनों एकजुट होकर परस्पर दोषारोपण की राजनीति न करते हुए, देशवासियों के हित में समाधान ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं । अनेक अवसरों पर दोनों पक्ष एक ओर हो जाते हैं। लेकिन हमारे देश हमने कभी ऎसी स्थिति नहीं देखी। ( सिवाय बाहरी आक्रमण की स्थिति को छोड़कर ) ।
आज देश बहुत ही गहरे संकट से गुज़र रहा है। कई लाख -करोड़ रुपयों की राशि ( राष्ट्रीय संपत्ति ) काले धन के रूप में अवैध तरीके से विदेशी बैंकोंमेंजमा है जिससे राष्ट्र की सारी गरीबी दूर की जा सकती है, भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुँच चुका है, यह ऐसा समय है जब कि सभी को एकजुट होकर इस धन को वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए । साथ ही देश के भीतर दमनकारी नीतियों का रास्ता छोड़कर जनता के हित में सत्ता को नीतिगत निर्णय लेने का साहस होना चाहिए।
किसने सोचा था कि गांधी, नेहरू, अम्बेडकर,फुले, दयानंद सरस्वती, टैगोर का यह देश आज ऎसी दीन और दयनीय स्थिति में होगा जहां केवल भ्रष्ट राजनीति ही देश का वर्तमान और भविष्य हो ।
हम सामान्य वर्ग के अति सामान्य नागरिकों को कब इस महामारी से मुक्ति मिलेगी।
दाई में ula
Sunday, April 3, 2011
भारत विश्व कप - विजेता
Friday, April 1, 2011
देश में क्रिकेट का उन्माद
आज देश भर में क्रिकेट का बुखार अपने चरम पर है। किसी खेल के प्रति हमारे देश का इस प्रकार का जुनून काबिले तारीफ़ है लेकिन मीडिया जिस भांति इस खेल को लोकप्रिय बनाने के लिए सारे दांव पेंच लगा रही है वह चिंता का विषय है। आज खेल-कूद और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी बाज़ार का विषय बन गए हैं और केवल पैसा कमाने का माध्यम बनाकर रह गयीं हैं। सिनेमा से लेकर रंगमंच और खेल-कूद तक - सारे क्षेत्र बाज़ार के निशाने पर हैं। बाज़ार अकूत धनोपार्जन का स्रोत है। बाज़ार का सीधा समीकरण विज्ञापन की दुनिया से है। विज्ञापन और प्रचार से करोड़ों रुपयों या डालरों की कमाई मीडिया के तानाशाह कर रहे हैं। मीडिया को देश-प्रेम या राष्ट्रीय संस्कृति से कुछ लेना देना नहीं है। वह केवल पैसे के लिए ही सब कुछ करती है। समूचे राष्ट्र को किसी भी घटना के खिलाफ या तरफ लोकचेतना को बनाने में मीडिया का ही दखल है। मीडिया जो दिखाती है, छापती है, उसे ही जनता देखती है और उसे ही सच मानती है, जब की हकीकत कुछ और ही होती है। आज हमारे चारों का वातावरण मीडिया के दखल से उतीदित है। देश जी आम जनता उसी ओर लहर की ओर बहती है जो लहर मीडिया पैदा करती है। क्रिकेट के विश्व कप टूर्नामेंट का आयोजन भारत जैसे गरीब देश में होना अपने आप में एक विडम्बना है । इस खेल में जो धन लगता है और जिस रूप में इसका वितरण होता है वह भी आम लोगों के लिए अकल्पनीय है। खिलाड़ियों से लेकर प्रायोजकों और मीडिया के प्रचारकों को अपार धन राशि की उपलब्धि होती है। इस धन का उपयोग देश के विकास के कार्यों के लिए नहीं किया जाता। केवल कुछ धनी समाज के हित में ही ये खेल और इनसे प्राप्त धन का उपयोग होता है। विश्व कप के मैचों को देखने के लिए अपार जाना समूह उमड़ पड़ता है । टी वी चैनलों में रात दिन केवल क्रिकेट संबंधी कार्यक्रम ही दिखाए जाते हैं। तरह तरह की व्याख्याओं विश्लेषणों द्वारा क्रिकेट संबंधी चर्चा जारी रखी जाती है। अखबार, पत्रिकाएँ, दृश्य और श्रव्य माध्यम अहर्निश क्रिकेट का ही राग आलापते रहते हैं।
चाहे कुछ भी हो, यह खेल हमारे देश का राष्ट्रीय खेल बन चुका है। सारा देश भारत के विजय की प्रतीक्षा कर रहा है। भारत का फाइनल में पहुँचना अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इधर कुछ वर्षों से भारतीय टीम ने विजय का अभियान जो शुरू किया है, उसकी चरम परिणति विश्व कप की जीत में ही होगी। आज देश का हर व्यक्ति, हर उम्र का, इस खेल की बारीकियों को समझने लगा है. इसीलिए लोग इस खेल में रूचि ले रहे हैं। भारत - पाकिस्तान के सेमी फाईनल प्रतियोगिता ने नए कीर्तिमान स्थापित किये। फाइनल में भजी भारत की जीत को लोग निश्चित मान रहे हैं। लोगों के इस विश्वास और देश केप्रति ऐसे जज़बात के प्रति हम नमन करते हैं और कामना करते हैं कि हमारा देश विजयी हो।
Tuesday, November 9, 2010
अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में ' शोध पत्रिका - ' समुच्चय' का लोकार्पण समारोह संपन्न
वे चिंतित थे।अपने असंतोष और गहरे दुःख को उन्होंने अपने लोकार्पण भाषण में व्यक्त किया।
लोकार्पण समारोह का प्रारम्भ सरस्वती वन्दना से हुआ। तत्पश्चात, विभाग के एम ए के छात्रों द्वारा एक प्रस्तुति (पावर पाइंट प्रणाली द्वारा ) दी गयी। कम्प्यूटर के भाषिक अध्ययन के अंतर्गत उन्होंने विश्वविद्यालय तथा विभाग की गतिविधियों पर एक छोटा सा कार्यक्रम बनकर उपस्थित लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया, जो कि प्रभावशाली था। इस समारोह में बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय के कर्मचारी और प्राध्यापक गण मौजूद थे। विभाग के छात्रों के अलावा दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्र भी उपस्थित हुए।
सर्वप्रथम मंचासीन विद्वानों के करकमलों से ' समुच्चय' पत्रिका का लोकार्पण किया गया। प्रो ऋषभदेव शर्मा ने पत्रिका की समीक्षा ( आलोचना ) करते हुए कहा कि। यह पत्रिका - सम्पादक द्वारा घोषित नीतियों के अनुकूल नहीं है। शोध पत्रिका में उन्होंने कुछ आलेखों पर तीखी आलोचना प्रस्तुत की। प्रो शर्मा के अनुसार- समुच्चय का प्रवेशांक आशा के विपरीत आकार में लघु तथा चयन में भी कुछ कमियाँ रह गयीं हैं । आलेख चयन में अधिक पारदर्शिता और शोधपरकता देखनी होगी। जगदीश्वर चतुर्वेदी के आलेख पर उनकी ख़ास टिप्पणी रही। कुल मिलाकर उनके भाषण का सार यही था कि आगामी अंक अधिक कसे हुए और उत्कृष्टता से भरपूर हों। सामग्री विशुद्ध शोध परक हो . डा राधेश्याम शुक्ला जी ने जी नेशोध पत्रिकाओं कि वर्तमान स्थिति पर अपने उदगार प्रकट किये । शोध की जब गुणवता होगी तभी शोध पत्रिका भी स्तरीय नहीं होगी। उन्होने चयन समिति को अधिक सख्ती बरतने का सुझाव दिया। हिन्दी में शोध पत्रकारिता बहुत पिछड़ी हुई है । शोध पत्रका के नाम पर आज भी बहुत कुछ कूडा कचरा ही आ रहा है। विश्वविद्यालयों में गिरते हुए शोध के स्तर के प्रति उन्होंने गहरी चिंता जताई। प्रो मोर्य ने प्रो ऋषभदेव शर्मा के वक्तव्यों के पारी सहमति जताई ।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में प्रो एम वेंकटेश्वर ने सभी अतिथियोंका स्वागत किया। साथ ही विगत एक वर्ष की विभागीय गतिविधियों पर संक्षेप में प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
इस कार्यक्रम का समापन शोध छात्र श्री अभिषेक द्वारा आभार प्रदर्शन के साथ हुआ ।
Friday, September 17, 2010
और एक हिंदी दिवस का आना और चला जाना.
स्वाधीनता प्राप्त के ६३ बरसों बाद भी हम आज तक अपनी भाषाई राष्ट्रीय अस्मिता को सिद्ध करने में असफल ही रहे। आज भी सरकार ( चाहे किसी भी दल की क्यों आई हो ) हिंदी को राष्ट्र भाषा घोषित करने के लिए खुलकर पहल नहीं कर रही है - ऐसा क्यों ? संविधान की हिन्दी भाषा संबंधी धाराएं अस्पष्ट हैं और अधूरी हैं। समय आ गया है कि उन अनुच्छेदों पर पुनर्विचार किया जाए और उनमें उचित संशोधन कर देश की भाषा नीति को स्पष्ट कर लागू किया जाए। हिन्दी और अंग्रेज़ी की यह आँख मिचौली आखिर कब तक चलेगी ? पीढियां गुज़र जा रहीं इस व्यर्थ के बोझ
को उठाते उठाते । देशवासी इतने उदासीन क्यों हैं - हमारी भाषा/भाषाओं के प्रति ? किसी भी बहुभाषी देश में किसी एक (सर्वसम्मत ) भाषा को शिक्षा, कामकाज और अन्य प्रयोजनों के लिए स्वीकार करना राष्ट्रीय धर्म है और कर्त्तव्य भी। ऐसा नहीं करना देशद्रोह हो सकता है। दुर्भाग्य से हमारे देश राजनेताओं ने आजादी के समय एक छोटी सी भूल कर दी उसीका खामियाजा आज तक देश भुगत रहा है। राष्ट्र की प्रमुख राजभाषा/राष्ट्रभाषा के प्रति उदासीनता और नीतिविहीनता ने आखिर देश को अनिश्चितता की स्थिति में ढकेल दिया। लेकिन इसकी किसी को परवाह नहीं है। १४ सितम्बर के दिन कम से कम हम सब लोग मिलकर हिन्दी भाषा की वर्तमान स्थिति के बारे मन कुछ देर के लिए विचार तो कर लेते हैं। इसके कार्यान्वयन की दशा और दिशा का आकलन कर लेते हैं। यही संतोषजनक कार्य है।
वैसे आज भारत में आज हिंदी की दशा पहले से बहुत सुधरी है और लोगों का दृष्टिकोण भी बदला है। हालाकि अंग्रेज़ी का प्रयोग बढ़ा है, लेकिन हिन्दी और भारतीय भाषाएँ भी अपना काम कर रहीं हैं, चुपके चुपके। बाज़ार और उपभोक्ता संस्कृति ने भारतीय भाषाओं और विशेषकर हिंदी को व्यावहारिक प्रयोग के लिए उपयुक्त बना दिया है। उपभोक्तावादी बाज़ार प्रणाली ने उत्पादों की बिक्री के लिए भारतीय भाषाओं को अनुवार्य सिद्ध कर दिया है। लेकिन यह बदलाव किसी दल, समुदाय या व्यापार की नीति के कारण नहीं हुआ। यह तो एक स्वचालित प्रक्रिया है जो आवश्यकता से उत्पन्न हुई है। इसका कोई सांस्कृतिक आधार नहीं है। सांस्कृतिक दृष्टि से हमारी भाषाओं को नुकसान ही हुआ है। अंग्रेज़ी और अन्य पाश्चिमी संस्कृति का प्रकोप और तेज़ हो गया है। शिक्षित शहरी वर्ग - हिन्दी और भारतीय भाषाओं को हीन दृष्टि से देखता है । उसे अमेरिका का आकर्षण भारतीय भाषाओं से दूर कर देता है। फिर जब हमारे देश में जब हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाएँ किसी काम की नहीं हों तो फिर कोई क्यों इन भाषाओं को सीखने या प्रयोग करने की दिशा में सोचेगा ? बुद्धिमान व्यक्ति वही है जोअपने भविष्य को सुस्थिर बनाने के लिए व्यावाहारिक्रूप से प्रचलित और रोज़गार की सम्भावनाओं वाली भाषा माध्यम को ही चुनेगा - और वह आज के परिदृश्य में निश्चित रूप से अंग्रेज़ी ही है। अंग्रेज़ी को अनिवार्य दर्जा देकर हम भारतीय भाषाओं का पक्ष कैसे ले सकत हैं, यदि लेते भी हैं तो वह केवल एक दिखावा है और छल है । सरकार और राजनीतिक दल आज भी हिन्दी और भारतीय भाषाओं के प्रयोग के उपायों को लेकर गंभीर नहीं है। यथास्थितिवाद ने देश को बरबाद कर दिया है। आज देश में किसी को अपनी भाषाओं के विकास की गंभीर चिंता नहीं है। एक विचित्र तदर्थवाद चल रहा है - जिसका समर्थन सभी लोग चाहे-अनचाहे कर रहे हैं।
आज भी हमारे सामने ये प्रश्न ज्वलंत रूप से मुंह बाए खड़े हैं कि हमारे देश में शिक्षा का माध्यम हिंदी अथवा भारतीय भाशाएं क्यो नहीं हैँ वह कौन सी मजबूरी है कि हम एक विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाकर अपना काम चलाने को बाध्य हैं ? हमारे देशवासी किसी एक भाषा को स्वीकार करने के लिए क्यों तैयार नही हैं ?
राजभाषा कार्यान्वयन का सही आकलन हो पा रहा है या नहीं। राजभाषा कार्यान्वयन कहीं कहीं पर केवल खानापूरी की ही स्थिति में ही मौजूद है। आज भी ये समस्याएँ देश के सम्मुख गंभीर रूप में विद्यमान हैं.
Saturday, June 12, 2010
भोपाल गैस काण्ड - एक राष्ट्रीय शोक या शर्म ?
आज सारा देश जवाब मांग रहा है- सभी राजनीतिक पार्टियों से और सभी नेताओं से। हर कोई जिम्मेदार है इस घिनौने विश्वासघात के लिए और राष्ट्रीय नरसंहार के लिए । आज हर कोई बचना चाहता है। एंडरसन को देश से सुरक्षित निकालने का दायित्व कोई लेने को तैयार नहीं । कायरता का इससे घिनौना रूप और क्या सकता है ? लाखो लोगो को हमेशा के लिए अपंग बनाकर देश की एक बड़ी जनसंख्या को नेस्तनाबूत करने का जघन्य अपराध करने वालो को इस तरह छोड़ देना - क्या यही लोकतंत्र है? हमारे देश में क्या लोगों को जीने का अधिकार नहीं है ?
उन लाखो निर्दोष लोगों को क्या कभी न्याय नहीं मिलेगा ? कौन दिलाएगा न्याय और मुआवजा ? अमेरिका की कूटनीति के सामने क्यों हम घुटने टेक देते हैं । क्या हम संप्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक राष्ट्र नहीं हैं ।
हमारी भोली भाली जनता इतनी निरीह है कि अपने अधिकारों के लिए लड़ना भी नही जानती है। यूनियन कार्बाइड कम्पनी ने अपना पल्ला यह कहकर झाड लिया है कि वह भारत की कानूनी सीमा में नहीं आती। साथ ही स्पष्टी शब्दों में उसने पुष्टि कर दी है कि भोपाल संयंत्र के रखा रखाव की जिम्मेदारी भारत की इकाई के संचालकों पर ही थी/है - इसलिए इसकी जवाबदेही भी भारतीय वैज्ञानिकों और अधिकारियों पर ही होगी। एक रोचक स्थिति उत्पन्न हो गई है। सारा देश दुःख और की आक्रोश की मुद्रा में है । सन १९८४ के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों को भी आज तक कोई मुआवजा या इन्साफ मिला है। हज़ारो लोग आज भी राहत शिविरों में इंतज़ार कर रहे हैं। जब जब भावनाओं का उफान आता है लोफ सडकों पर निकल पड़ते हैं - अपने मृत जनों की तस्वीरों को गले में लटकाए हुए । कौन उन्हें न्याय दिलाएगा ? .क्या आज तक कोई सत्ताधारी दल इनकी गुहार सुना है। घोषित अपराधी भोपाल त्रासदी के महत्वपूर्ण पदों पर सत्ता का सुख भोग रहे हैं क्या निरीह बेबस जनता सडकों पर भीख मांग मांग कर अपना गुज़ारा कर रही है।

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