Tuesday, February 21, 2017

हिंदी बचाओ आंदोलन

भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं का उल्लेख हुआ है जिसमें अंग्रेजी नहीं है । इन 22 भाषाओं में हिंदी की बोलियों को शामिल कर इन्हें हिंदी से पृथक और स्वतंत्र  दर्जा दिए जाने की पहल चल  रही है, जो की हिंदी की अस्मिता और अस्तित्व के घातक है । यदि अवधी, भोपुरी, ब्रज, बुड़ेली, मागधी, राजस्थानी आदि बोलियों को हिंदी समांतर भाषा का दर्जा देकर आठवीं अनुसीची मे स्वतंत्र भाषा के रूप मे स्थापित कर दिया जाए तो इन भाषाओं मे रचित साहित्य हिंदी साहित्य की गरिमामय सांस्कृतिक विरासत से छिटककर अलग थलग पद जाएगा और ये सब हिंदेतर भाषाओं के साटी कहलाएंगे । रामचरित मानस और सूरसागर तथा मीरा के काव्य को हिंदी साहित्य नहीं माना जाएगा और ये हिंदी से बहिष्कृत हो जाएंगी । यही नहीं बल्कि हिंदी भाषा जो कि इन्हीं सब बोलियो के समुच्चय से ही हिंदी का एक व्यापक अखिल भारतीय स्वरूप है जो भारत उपमहाद्वीप में सदियों से हिंदी साहित्य के नाम से ही अपनी पहचान बना चुका है । हिंदी का मध्यकालीन साहित्य अवधी, ब्रज, मैथिली, भोजपुरी आदि बोलियों मे रचित महत्वपूर्ण साहित्य है । समूचा भक्तिकाल ब्रज, अवधी और राजस्थानी तथा मैथिली के साथ अनेक स्थानीय बोलियों में रचा गया जिनके सम्मिलन और समावेश से ही हिंदी का एक विलक्षण सर्वसमावेशी स्वरूप निर्मित हुआ है जो कि अब खतरे मे है । हिंदी की बोलियों को हिंदी से अलग नहीं किया जा सकता जिसे आज के राजनेताओं को समझने की जरूरत है । केवल वोट बैंक की राजनीति खेलने के लिए देश की अस्मिता और पहचान, जो भारतीयता का प्रतीक है, हिंदी, उसे यदि उसकी बोलियों से वंचित कर, उसे  एकाकी कर दिया जाए तो यह बहुत बड़ी भूल होगी और भारतीय भाषिक अस्मिता के लिए बहुत ही बड़ा खतरा होगा । हिंदी एक व्यापक और विराट स्वरूप को धारण किए हुए है जिसमें अनेकानेक बोलियाँ और संस्कृतियाँ समाई हुई हैं जिन्हें पहचानना आवश्यक है । स्थानीयता और क्षेत्रीयता की संकीर्णतावादी विचारधारा के प्रसार को रोकना होगा । इसके लिए समस्त भारत को कटिबद्ध होकर एकता की भावना से हिंदी की रक्षा करने के अभियान में स्वयं को समर्पित करना होगा । 

Sunday, July 31, 2016

भारत मे शिक्षा का माध्यम : समस्याएँ अनेक पर समाधान एक भी नहीं !

भारत की बहुभाषिकता और संस्कृति बहुलता स्वाधीनता के पश्चात भी सुई तरह से कायम है जैसे स्वतन्त्रता के पहले मौजूद थी । आज़ादी से पूर्व भारत उपमहाद्वीप अथवा यह भूखंड अनगिनत राजे-रजवाड़ों मे विभाजित था और हर राज्य का अपना विशेष राज्यध्वज, अपनी भाषा और अपनी धार्मिक आष्टा एवं परंपरा हुआ करती थी । राज्य विस्तार के लिए निरंतर युद्ध होते थे और जय-पराजय का निर्विराम सिलसिला यूं ही चलता रहता था । हर राज्य अपनी राज्य भाषाओं को सुनिश्चित और घोषित करता और उसी मे राजकाज, शिक्षा, व्यापार, वाणिज्या एवं इतर कामकाज सारे उसी भाषा मे बिना किसी व्यवधान या अवरोध के संपन्न होते रहते  थे । हर राज्य पूर्णत: संप्रभुतासंपन्न सार्वभौम राज्य हुआ करता था जहां अपनी भाषा अर्थात राज्य की, जनता की मातृभाषा के प्रयोग पर किसी तरह प्रतिबंध अथवा प्रतिरोध नहीं होता था । ऐसे ही अनेकों छोटे बड़े राज्यों के समूह का विलीनीकरण भारत राष्ट्र में सन् 1947 मे जब हुआ तो किसी ने कल्पना नहीं की थी कि इस सुविशाल उपमहाद्वीपीय भूखंड को राष्ट्र का दर्जा प्राप्त होते ही राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक के रूप मे कोई एक भी भाषा सर्वसम्मति से उपलब्ध नहीं होगी । भारत राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं के भीतर कहने को तो भाषाओं की बहुलता अकल्पनीय और संख्यातीत हैं किन्तु यह राष्ट्र दुर्भाग्य से किसी एक भाषा को राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक के रूप मे विश्व के सम्मुख आज तक घोषित नहीं कर सका है । इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है ।  संविधान में भाषाओं को राष्ट्रीय दर्जा दिलाने के लिए कुछ प्रमुख भाषाओं का चयन किया गया जिसकी संख्या 14 से बढ़कर आज 22 कर दी गई । सविधान मे कहीं भी भारत मे शिक्षा के माध्यम को घोषित नहीं किया गया ।  हिंदी को सबसे बड़ी भाषा के रूप मे स्वीकार तो किया जाता है किन्तु उसे राष्ट्र-भाषा की पहचान नहीं प्राप्त हुई ।   वह 22 राष्ट्रीय भाषाओं में एक है । हिंदी का प्रयोग करने वालों की संख्या सर्वाधिक माना जाता रहा है किन्तु जैसे मैथिली, ब्रज, अवधी, भोजपुरी राजस्थानी, बुन्देली आदि उपभाषाओं ( बोलियों के रूप मे ख्यातिप्राप्त ) को हिंदी से पृथक भाषा की मान्यता प्रदान कर संविधान में ( आठवीं अनुसूची में ) शामिल करने की दिशा मे होने प्रयासों के अनुमान से हिंदी की स्थिति पहले से अथिक कमजोर हो जाएगी । स्वाधीनता प्राप्त से पूव तक उपर्युक्त भाषाओं मे रचित साहित्य को हिंदी साहित्य का ही महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया । कबीर, सूर (ब्रज), तुलसी ( अवधी ), विद्यापति ( मैथिली ) आदि को हिंदी के ही कवियों की पहचान मिली हुई है । अब इन्हें हिंदी निकाल बाहर करना होगा और ऐसी स्थिति मे हिंदी भाषी अल्पा संख्यक हो जाएंगे और हिंदी भी अल्पसंख्यकों की भाषा बनकर रह जाएगी जिससे इसकी राष्ट्रभाषा की दावेदारी भी शिथिल पड़ जाएगी ।
भारत की भाषिक समस्याओं मे से सबसे प्रधान समस्या है देश मे शिक्षा के माध्यम की । सन् 1947 और 1950 से देश आज बहुत आगे निकल आया है । गांधी और नेहरू युग कभी का भुला दिया गया । स्वदेशी भाषा अभियान के आंदोलनकारी, महात्मा गांधी, बालगंगाधर तिलक, दयानंद सरस्वती, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, मोटूरी सत्यनारायण,  बंकिम, रवीन्द्र और शरत, भारतेन्दु हरिश्चंद्र,  महावीर प्रसाद द्विवेदी, गुलेरी, राजा लक्ष्मण सिंह, राजा शिवप्रसाद, जैसे कर्मठ मातृभाषा प्रेमी, स्वभाषा प्रेमी जननायकों और भारतीयतावादी चिंतकों और मनीषियों को आज भूमंडलीकरण, उदारीकृत बाजारवाद और पाश्चात्य-वादी रुग्ण मानसिकता की आत्मघाती बौद्धिक परंपराओं ने देश की भाषिक बुनावट को तहस-नहस कर डाला है । आज़ादी के 69 वर्षों  बाद भी हम अपने देश के लिए कोई एक अपनी भाषा मे अपनी शिक्षा प्रणाली का (पूर्ण स्वदेशी शिक्षा प्रणाली ) निर्माण नहीं कर पाए हैं । स्वतंत्र भारत के लिए महात्मा गांधी की भाषा नीति, भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए अत्यंत कारगर और उपयुक्त थी जिसे नवभारत के कर्णधारों ने अनदेखी कर दी और अंग्रेजी के क्षणिक मोह मे पड़कर देश की शिक्षा नीति का सर्वनाश कर दिया । समय के साथ साथ अंग्रेजी पक्षधरों की संख्या अपने अप बढ़ाने लगी और आज स्थिति बहुत ही गंभीर है । आज की पीढ़ियाँ अपने आप को भारत मे अंग्रेजी से पृथक करके नहीं कल्पना कर सकतीं । इसकी जिम्मेदार हमारी अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा प्रणाली है ।   अंग्रेजी को जब रोजगार ई भाषा बना दिया गया तो फिर भारतीय भाषाओं का अस्तित्व दोयम दर्जे का हो ही जाता है । हिंदी और भारतीय भाषाएँ केवल अनुवाद के लिए ही प्रयोजनकारी होकर रह गई हैं । किसी भी विषय का ज्ञान का साहित्य भारत मे किसी भी भारतीय लेखक विशेषज्ञ द्वारा किसी भी भारतीय भाषा मे मूल रूप से नहीं लिखा जाता, क्योंकि उसे बाजार नहीं  मिलता और उसकी उपयोगिता शिक्षा जगत मे नहीं है । आज अंग्रेजी माध्यम के कारण लाखों ग्रामीण छात्र (अंग्रेजी के पर्याप्त कौशल के अभाव मे ) शहरी परिवेश के अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के सम्मुख अपनी योग्यता सिद्ध करने मे असमर्थ और लाचार दिखाई देते हैं । शिक्षा आ सर्वोत्तम माध्यम मातृभाषा ही हो सकती है जो कि वैश्विक स्तर पर भाषाविदों द्वारा स्वीकृत सत्य है जिसे भारतीय राजनीतिक व्यवस्था नहीं जानना चाहती । भारत कि सर्वांगीण विकास का माध्यम अंग्रेजी को ही मानने वाले देश के नीतिकारों का ध्यान इस ओर कब जाएगा ? इसका अनुमान लगाना कठिन है । किन्तु हम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं और अपने देशवासियों के हितों को अवरुद्ध कर रहे हैं । चीन, जापान, कोरिया, रूस, जर्मनी, फ्रांस, ( यूरोप के तमाम अंग्रेजेतर देश ) , सभी ने तकनीकी और वैज्ञानिक, व्यापारिक और वाणिज्यिक प्रगति अपनी भाषाओं के माध्यम से ही हासिल की है । वे अंग्रेजी को केवल एक विदेशी भाषा के रूप मे ही देखते और सीखते हैं, उनके देशों मे कहीं भी कभी भी, विदेशी भाषा शिक्षा का माध्यम नहीं रही है और भविष्य मे कभी नहीं रह सकती । इन देशों के उदाहरणों से हमे कुछ तो सीख लेनी चाहिए ? तुर्की ने यूरोप के बहुत बड़े भूभाग पर बहुत लंबे समय तक राज किया किन्तु जब उन्नीसवीं सदी के मध्य मे उनका शासन जब समाप्त हुआ तो उसके बाद उन स्वाधीन देशों मे कहीं भी उनके पूरवा शासक अर्थात तुर्कों की तुर्की भाषा का नामोनिशान उन यूरोपीय देशों मे आज कहीं नहीं पाया जाता । इतनी सारी मिसालें काया कम हैं ? अभी भी हमें उस गहरी मादक नींद से जागना होगा और अंग्रेजी के भूत को जिसने हमारी आत्मा को जकड़ रखा है, उसे भगाना होगा, तभी हमारे लिए मुक्ति का मार्ग खुल सकता है । हम तभी सच्चे अर्थों मे अंग्रेजी उपनिवेशवादी मानसिकता से आज़ाद होंगे ।   

Saturday, July 23, 2016

               
                                      डॉ एम वेंकटेश्वर
                                पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष
                            हिंदी एवं भारत अध्ययन विभाग   
                      अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद 
                               मो : 9849048156
                                     mannar.venkateshwar9@gmail.com

            प्रशासनिक एवं अकादमिक सेवाएँ  : 
                       
                        1          सदस्य, संयुक्त हिंदी सलाहकार समिति, अन्तरिक्ष एवं परमाणु ऊर्जा मंत्रालय,
                                    नई दिल्ली   2015
                        2          अतिथि प्रोफेसर, राजीव गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, ईटानगर, अरुणाचल प्रदेश
                                    2012 से ।
                        3          प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी एवं भारत अध्ययन विभाग, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा-
                                    विश्वविद्यालय, हैदराबाद 2009 – 2011
                        4          प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद ।
                                    2001 – 2003
                        5          अध्यक्ष पाठ्यक्रम बोर्ड, हिंदी विभाग, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद ।
                                    2002-2003
                        6          परीक्षा नियंत्रक, (COE ) उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद 2004-2006 
                        6          प्रिंसिपल, यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड सोशल साइंसेस, उस्मानिया
                                    विश्वविद्यालय, हैदराबाद 2001 – 2004
                        7          सदस्य, कार्यकारिणी समिति (EC ), उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद ।
                        8          अतिथि प्रोफेसर, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय 2007 – 2009
                        9          अतिथि प्रोफेसर, डॉ मर्रि चेन्नारेड्डी इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन रिसोर्स डेवेलपमेंट,                          हैदराबाद  2008 से ।
                        10        विजिटिंग प्रोफेसर, इन्डालॉजी, सोफिया विश्वविद्यालय, सोफिया, बुल्गारिया                                     1996 – 2000    

            शैक्षिक उपलब्धियां :
                        1          एम ए (हिंदी ) : उस्मानिया विश्वविद्यालय : 1972
                        2          पीएच डी (हिंदी साहित्य ) : उस्मानिया विश्वविद्यालय : 1979
                                    ( हिंदी उपन्यासों पर फ्रायडीय मनोविज्ञान का प्रभाव )
                        3          अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान में पी जी डिप्लोमा, उस्मानिया विश्वविद्यालय, 1990
            विश्वविद्यालयी शोध निर्देशन :

                        1          एम फिल उपाधि के लिए 22  शोधार्थी
                        2          पीएच डी उपाधि के लिए 20 शोधार्थी

            लेखन एवं प्रकाशन :

                        1          हिंदी उपन्यासों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन
                        2          हिंदी उपन्यासों में मनोविकृत पात्र
                        3          हिंदी के समकालीन महिला उपन्यासकार
                        4          आठवें दशक के हिंदी उपन्यास
                        5          प्रयोजनमूलक हिंदी विविध आयाम
                        6          जीवन वृन्दावन ( अनुवाद )
                        7          संकल्य “ बच्चन विशेषांक “ ( संपादन )
                        8          समुच्चय – अंक 1 और 2  ( सं )
                        9          भास्वर भारत ( मासिक ) ( संयुक्त संपादक )                                                                       10        प्लेमक बुल्गारियान साहित्य पत्रिका ( सं )

              पुरस्कार एवं सम्मान :  

                        1          गंगाशरण सिंह हिंदी सेवी पुरस्कार ( राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत )  2015
                        2          हिंदी सेवी सम्मान, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा 2015  
                        3          साहित्य शिरोमणि पुरस्कार, हिंदी उर्दू साहित्य समिति, लखनऊ 2014    
                        4          सौहार्द्र सम्मान : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान 2002                 
                        5          बिहार राष्ट्र भाषा पुरस्कार : पटना 2009
                        6          बेस्ट टीचर एवार्ड  : आंध्र प्रदेश सरकार, हैदराबाद  2004

          विशेषज्ञता :
                                    1          आधुनिक हिंदी साहित्य ( काव्य, कथा साहित्य )
                                    2          सामान्य भाषा विज्ञान
                                    3          हिंदी भाषा शिक्षण
                                    4          शोध प्रविधि एवं प्रक्रिया (रिसर्च मेथडॉलॉजी )
                                    5          प्रयोजनमूलक हिंदी, राजभाषा हिंदी कार्यान्वयन
                                    6          अनुवाद विज्ञान
                                    7          भारतीय साहित्य
                                    8          हिंदी पत्रकारिता
                                    9          मीडिया लेखन
                                    10        सिनेमा ( भारतीय एवं हॉलीवुड )
                                    11        साहित्य विमर्श (दलित, स्त्री, अल्पसंख्यक, आदिवासी जनजातीय )
                                    12        अंग्रेजी कथा साहित्य ।

            हिंदी प्रचार एवं सेवा कार्य :  

                        1          विगत 40 वर्षों से हिंदी भाषा और साहित्य का
                                    अध्ययन/अध्यापन/शोध कार्य में निमग्न
                        2          हिंदी भाषा और साहित्य का प्रचार और प्रसार
                                    ( स्वच्छंद संस्थाओं में, ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों
                                    और कालेजों में व्याख्यानों, कार्यशालाओं तथा
                                    संगोष्ठियों के माध्यम से भारतीय भाषाओं के परिप्रेक्ष्य में )               
                         3         100 से अधिक शोध लेख प्रकाशित / आज भी लेखन कार्य जारी । ( राष्ट्रीय और
                                    अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में )
                         4         चार वर्षों ( 1996 – 2000 )  तक यूरोप के विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्यापन
                                    तथा हिंदी तथा भारतीय भाषाओं, संस्कृति का अध्यापन,प्रचार, प्रसार )
                                    ( बुल्गारिया, पोलेंड, ग्रीस, आस्ट्रिया और जर्मनी के विश्वविद्यालयों में
                                    व्याख्यान  और भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार )
                          6        8 अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों तथा 40 से अधिक राष्ट्रीय संगोष्ठियों में प्रतिभागिता ।
                          7        हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय भागीदारी । ।
                          8        आंध्र प्रदेश के सुदूर ( अहिंदी भाषी ) ग्रामीण प्रान्तों में कार्यरत हिंदी अध्यापकों के
                                    लिए भाषा शिक्षण संबंधी शिविर, कार्यशालाओं तथा पुनश्चर्या कार्यक्रमों का 
                                    स्वैच्छिक ( सेवा भाव से ) आयोजन और मार्गदर्शन के साथ साथ हिंदी भाषा का
                                    प्रचार –प्रसार के कार्य में निरंतर मग्न ।
                        9          देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में अतिथि आचार्य के रूप में अस्थाई तौर पर
                                    अध्यापन और शोध निर्देशन जारी । ( हैदराबाद विवि, काकतीय विवि, वर्धा
                                    विवि, कर्नाटक विवि, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा – मद्रास, हैदराबाद,
                                    कोचीन धारवाड़,  अरुणाचल प्रदेश – राजीव गांधी विवि आदि ) ।
             
                        संप्रति :
                                    स्वतंत्र लेखन । हिन्दी, अंग्रेजी एवं तेलुगु साहित्य समीक्षा लेखन, भारतीय एवं
                                    हॉलीवुड सिनेमा समीक्षा, हिंदी तेलुगु अंग्रेजी – अंतरभाषिक अनुवाद लेखन ।




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MY CV


Dr M Venkateshwar
Formerly
Professor & Head
Department of Hindi & India Studies
The English and foreign Languages University
Hyderabad 500007
M- 09849048156


1        Academic & Administrative  Positions     :
    
          Member, joint advisory committee for Hindi, Ministry of space & Atomic                            Energy, New Delhi.  
     Visiting Professor, Rajiv Gandhi University, Itanagar, Arunachal Pradesh
2012 onwards.
Visiting Professor of Indology, University Sofia, Bulgaria.  1996 – 2 000
            Head, Department of Hindi & India Studies, EFL University  2009 – 2011
Controller of Examinations, Osmania University.   2004 – 2006
            Principal, Arts College, Osmania University.          2000 – 2004
            Member, Executive Council, Osmania University.  2002 – 2005
            Head, Department of Hindi, Osmania University.    2000 – 2002
            Chairman Board of Studies, Hindi, Osmaina University.  2003 – 2005
            Guest Faculty, Dr MCR Institute of HRD,  Hyderabad .   2008 onwards
            Guest Faculty, Department of Hindi,University of Hyderabad.  2007 – 2009
Director, Admissions & Examinations, Telngana University, Nizamabad.  2007
Professor of Hindi, Osmania University, Hyderabad  1996 – 2006
2        Education

            M.A. Hindi  Osmaina University       1972
            Ph.D. Hindi Osmania University        1979
            PG Diploma in Applied Linguistics    1990

3        Publications :

            Books – Five
            Research Papers – 70
            Other articles – more than 100
            Books edited – Five

4        Research Guidance     

            Ph.D. –   20 Scholars
            M.Phil  - 22 Scholars


5        Area of specialization  

            General Linguistics
            Research Methodology
            Translation Studies
            Modern Hindi Literature
            Indian Literature
            Hindi Language Teaching ( HLT )
            Functional Hindi
            Implementation of Official Language
            Media writing
            Cinema ( Indian & Hollywood  )                                                       

6        Countries Visited

            Bulgaria, France, UK, Poland, Romania, Turkey,
            Greece,  Hungary, Austria, Italy, Check Republic,
            Croatia, Yugoslavia,  Dubai.
            ( On academic assignments & tourism )

7        Honors and Awards

1                    Gangasharan singh National Award ( President of India ) 2015
2                    Hindi Seva Samman 2015, Mahatma Gandhi Antar-Rashtriy Vishwavidyalaya, Wardha.
          3        Sahitya Shiromani Award, Hindi-Urdu literary association,                                             Lucknow 2014
          4        Bihar Rashtra Bhasha Parishad Award 2009
( Government of Bihar )
        5        Best Teachers Award 2004
Governemnt of Andhra Pradesh, Hyderabad 
          6        Uttar Pradesh Hindi Sansthan National Award 2001
( Sauhaarda Samman ) 




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